Tuesday, 6 January 2015

पीके पर विमर्श का रॉन्ग नंबर ।

अलसुबह दफ़्तर से घर की ओर जा रहा था।गली में भगवा वस्त्र पहने बाबा अचानक से टकरा गए।माथे पर बिना रज़ामन्दी के टीका लगा दिया और शनि का प्रकोप दिखाकर रूपये ऐंठने की कोशिश करने लगे।अपने झोले से सांप निकाल पैसे उस पर छुआने को कहा।मैंने मना किया तो ठग बाबा गुंडागर्दी पर उतारू हो गए।अभी तक कृपा का स्त्रोत सांप भय पैदा करने का ज़रिया बन चुका था।उसे मेरे नज़दीक ला कर वह खुलेआम गुंडागर्दी करने लगे।भला हो नज़दीक खड़े एक जानकार का जिनके शोर मचाने से ठग बाबा की हवा निकल गई और झोले में रखे पैसे वो वापस हाथ में थमाकर फौरन रफ्फूचक्कर हो लिए।यह घटना मेरे लिए इसलिए भी चौंकाने वाली थी क्योंकि कुछ समय पहले एकदम ऐसी ही घटना का सामना कर चुका था।यह अनुभव इसलिए साझा किया क्योंकि हाल में अंतरिक्ष से आए पीके पर ख़ूब बवाल मचा है।पीके से मुलाक़ात के दौरान मुझे भी अपने पर यहीं गुज़री याद आ गई थी।दूसरी दुनिया का यह सिनेमाई किरदार पृथ्वी पर आता है और यहीं से कहानी की शुरूआत होती है।कहानी के शुरूआती कुछ भाग से ही समझा जा सकता है कि इसका उद्देश्य धर्म,आस्था के नाम पर चलने वाले ठगी के विशाल साम्राज्य पर हल्ला बोलना है।पीके रोजमर्रा की ज़िंदगी में चल रही कुछ गतिविधियों पर हमारी ख़ामोशी के बीच शोर मचाता है।पीके सवाल पूछता है कि जिस ऊपर वाले को दुनिया का रचियता कहा जाता है उसे अपने ही बच्चों से जुड़ने के लिए धर्म के ठेकेदारों की ज़रूरत क्यों होगी ? (पीके इन्हें मैनेजर कहता है)

उदाहरण के तौर पर शिरडी के साईं हमेशा अपने फक़ीराना अंदाज़ के लिए पहचाने गए । आज उनके मैनेजरों ने इसी फकीर साईं को शाही ठाट-बाट का प्रतीक बना डाला है।कहा जाता है कि साईं अपने जीवनकाल में भीक्षा से ही खानपान का बंदोबस्त करते थे।यह साईं कैसे हो सकते हैं जो करोड़ों की भेंट लेते हैं,सोने के सिंहासन पर विराजमान हैं, बेहिसाब धन-दौलत के जाल में फंसकर मुफलिसी के अँधकार में डूबे अपने बच्चों के साथ भेदभाव करते हैं।मसला सिर्फ़ दान का नहीं बल्कि इसके आधार पर बरते जाने वाले दोहरे मापदंड से है।यह रॉन्ग नंबर नहीं तो क्या है जहां उनके भक्तों की सामाजिक,आर्थिक हैसियत साईं के दर्शन के लिए पहला पैमाना होता है।सम्पर्कों और धन दौलत वालों के लिए ख़ास वीवीआईपी सुविधाएं हैं।साधारण आदमी यहीं लम्बी कतारों के मार्फ़त दोयम दर्जे का व्यवहार पाता है।



पीके जितना हमारी तरह दिखता था सोचता उतना ही जुदा था




ज़ाहिर है कि करोड़ों और अरबों का व्यापार कर रहे ठगों को पीके से एतराज़ होना था।एक स्वामी शंकराचार्य स्वरूपानंद का बयान आया और मुख्यधारा का मीडिया फिल्म पर अपने विवेकानुसार बहस छेड़ने के बजाय उनके एजेंडे पर अमल करते हुए बहस का दरबार सजा बैठा।किसी ने पीके के सवालों का जवाब नहीं मांगा।स्वभाविक तौर पर वह इन सभी सवालों के जवाब दे भी नहीं सकते थे।इसलिए,चर्चा के मुख्य विषय वस्तु मुसलमान(ख़ासकार आमिर के चलते) और इस्लाम तक निपटा दिये गए।कितना बेहतरीन रहता अगर पीके के सवालातों के आधार पर भी चर्चा होती।आस्था,धर्म के नाम पर चल रहे गोरखधंधे,भिन्न-भिन्न धर्मों के बीच ग़लतफ़हमियां उत्पन्न कर नफ़रत पैदा करने वाले सोच पर चर्चा होती,हालिया घटनाओं के ज़रिये बाबागीरी में अपराधीकरण के बोल बाले पर भी बात होती । यह सब सवाल सत्ता,धर्म और पूंजी के गठजोड़ ने बेहद गौण कर दिये । फिल्म को हिंदू धर्म के खिलाफ़ षड्यंत्र बताने वालों में अधिकांश ने शायद यह फिल्म देखी तक नहीं । कुछ टिप्पणी करने की रस्म अदायगी पूरी करने के लिए भी सुनी सुनाई और दूसरों की लिखी जा रही बातों के आधार पर अपने विचार व्यक्त करने लगे । जबकि,असलियत ये है कि फिल्म में भारत जैसे विविधितापूर्ण देश के लिहाज़ से सभी धर्मों को शामिल किया गया है।अपनी एक तयशुदा सीमा के कारण किसी पर कम तो किसी पर ज़्यादा व्यंग्य अथवा कटाक्ष किये गए । ऐसा कहते हुए हमें देश की बहुसंख्यक आबादी और उसी के हिसाब से बाज़ार की ज़रूरत को भी समझना होगा ।

अफ़सोस कि फिल्म पर हुए सार्वजनिक विमर्श का संकुचित दायरा कट्टरपंथियों के लिए ध्रुवीकरण का औज़ार बन गया।बिना किसी ठोस आधार फिल्म को इस्लाम बनाम हिंदुत्व का मंच बनाया गया।हालांकि,मुख्यधारा के मीडिया में चल रहे विमर्श से ऐसे सतही विमर्श से ज़्यादा की आशा करना भी बेईमानी है। क्योंकि, उन्हें तो निर्मल बाबा से लेकर रामदेव तक रिश्ते निभाने हैं । अंतत: एक नेक उद्देश्य के लिए बनी फिल्म बाज़ार में रिकॉर्डतोड़ सफ़लता हासिल करने के बावजूद नतीजे के नाम पर सिफर रही।दरअसल,पीके और समाज के बीच होने वाले जनसंचार के सभी माधय्म रॉन्ग नंबर पर लगे थे।असली पीके और उसके सवालों से संवाद न के बराबर हुआ।भारत की सामाजिक बुनावट और मौजूदा दक्षिणपंथी राजनीति के उफ़ान में सबकी नकली पीके से बात करवाई जा रही हैं।तो क्या पीके जैसी फिल्म का बनना ही ग़लत है ? हरगिज़ नहीं,यह एक मिसाल भर है मौजूदा राजनीतिक,सामाजिक और पूंजीवादी मॉडल की ताक़त का । वह जैसे चाहेंगे चीज़ों को अपने अनुकूल बना लेंगे ।

Friday, 19 December 2014

गोडसे अंत है और महात्मा गांधी अनंत हैं ।

केंद्र में मोदी सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद से एक शख़्स को लगातार ललकारा जा रहा है।यह काम खुद सरकार से जुड़े बदज़ुबान सांसद,संगठनों के नेता कर रहे हैं।यह शख़्स कोई और नहीं बल्कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हैं।जिस महात्मा गांधी को कांग्रेस इस क़दर हाशिये पर धकेल चुकी थी कि उनके दिखाए रास्तों पर चलना तो दूर उनकी चर्चा महज़ रस्म अदायगी बन चुकी थी,आज उसी गांधी की सामाजिक,सांस्कृतिक प्रतिबद्धता को खारिज किया जा रहा है।आखिर,एनडीए सरकार के शुरूआती कार्यकाल में साबरमती का ये संत सबसे मजबूत विपक्ष कैसे बनता जा रहा है ? बापू पर बीजेपी सांसद साक्षी महाराज,आरएसएस का केरल से निकलने वाला मुखपत्र,मुंबई में विहिप की महासभा में साध्वी सरस्वती के हमले तो सिर्फ़ एक बानगी भर है।सुनियोजित ढंग से राष्ट्रपिता की छवि को अपनी सहूलियत के अनुकूल नायक,खलनायक में बदल कर नए तरीके से गढ़ा जा रहा है।असल में नरेंद्र मोदी बेशक देश और विदेश में महात्मा गांधी का गुणगान करें लेकिन उनकी सरकार से जुड़े अधिकांश समर्थकों,मंत्रियों,नेताओं के सोच का बापू के पवित्र विचारों से मुठभेड़ होना बेहद लाज़िमी है।क्योंकि,महात्मा गांधी ने जब से भारतीय राजनीत में प्रवेश किया तब ही से हिंदुत्व की राष्ट्रवादी राजनीति और कांग्रेस के अभिजातीय वर्ग को उनसे कड़ी चुनौती मिली है।बापू ने यूरोपीय राष्ट्रवाद की शहरी और अर्ध शहरी लोकप्रियता को तोड़ते हुए देश के दिल देहातों में दस्तक दी थी।

अपने एजेंडा की रूपरेखा पेश करते हुए उन्होंने पहली दफ़ा ही कांग्रेस अधिवेशन में अपना भाषण देते वक़्त डंके की चोट पर कांग्रेस के राजनैतिक आंदोलन को दिल्ली और मुंबई की शहरी राजनीति बताकर संगठन की किरकिरी कर दी थी। इस गांधी से शुरू-शुरू में कांग्रेस के अभिजातीय तबके तक को चुनौती पेश आई थी पर गांधी के नेतृत्व में आगे बढ़ने के सिवा कांग्रेस के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था।दूसरी तरफ़ अपने दौर के उफ़ान पर पहुंचे हिंदू राष्ट्रवाद के अधिकांश नेता भारत की सांस्कृति और सामाजिक विविधिता से कटे हुए थे इसलिए उनके कुम्बे में हड़कंप स्वभाविक था।बापू ने आस्था और धर्म में विश्वास को बनाए रखते हुए जिस सेकुलर भारत के ताने बाने को बुनना शुरू किया था उसमें वर्चस्व का तत्व मौजूद नहीं था। संघ परिवार के कारकुन अक्सर गांधी की हत्या को 'वध' कहते हैं और विश्व की मानवता के सबसे बड़े ज्योतिपुँज महात्मा गांधी की हत्या पर शौर्य दिवस तक मनाते हैं।गोडसे को राष्ट्रभक्त साबित करने के लिए अपने फॉर्मूला पर अमल करते हुए साज़िशन इतिहास को मनचाहे तरीके से पेश करने में अचूक राष्ट्रवादियों की बिग्रेड उन्हीं पर विभाजन की तोहमत मड़ती है।जबकि,हक़ीकत यह है कि गोडसे ने जो किया वो राष्ट्रप्रेम नहीं हिंदुत्ववाद की राष्ट्रवादी राजनीत थी जिसे गांधी से भय लगता था। 


 नाथूराम गोडसे और महात्मा गांधी

इतिहास गवाह है कि गांधी ने बंटवारे को रोकने के लिए हर मुमकिन प्रयास किया।बापू ने भारत के आखिरी वायसरॉय,नेहरू,जिन्ना तक को साफ़ लफ़्ज़ों में कह दिया था कि मुल्क का बंटवारा मेरी लाश से हो कर गुज़रेगा।यहीं से बापू हाशिये पर धकेल दिये गए क्योंकि साम्राज्यवादी ताक़ते अपने दांव पहले ही चल चुकी थी।फिर भी बापू ने जनवादी कामकाज को जारी रखते हुए दंगों की आग से झुलसते मुल्क को मरहम लगाने का काम किया।दिल्ली में दंगों की आग इतनी भयावह थी कि 'आधी रात को आज़ादी' पुस्तक के मुताबिक नेहरू और पटेल ने लुईस माउंटबेटन के आगे स्थिति काबू करने में असमर्थता जता दी थी।मगर साबरमती के लाल ने तमाम माहौल बिगाड़ने वाले संगठनों(पुस्तक के मुताबिक इसमें आरएसएस भी शामिल रहा) को क़ाबू में करते हुए ऐसा सौहार्द बनाया कि दिल्ली की जामा मस्जिद में क़ौमी एकता का नज़ारा उस वक्त कईयों को चौंकाता था।फिर भी राष्ट्रवाद की अफीम बेच रही ब्रिगेड बापू की छवि को इस क़दर धूमिल करने में कामयाब हो जाए कि बच्चा-बच्चा 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी' बोलें तो इससे बड़ी विडंबना क्या होगी।आज का राष्ट्रवाद भी भीतर से पूरी तरह खोखला है जब ही ये जंल,जंगल,ज़मीन की बात करने से कतराता है,कश्मीर की समस्याओं पर बात करने से हिचकता है,नक्सवाद जैसी समस्या का राष्ट्रवादी द्ष्टिकोण से विश्लेषण कर उसका सरलीकरण करता है।इस देश की सांस्कृतिक,सामाजिक विविधिता की बुनावट का सूत्रीकरण हिंदू राष्ट्र के रूप में करने की नासमझी करता है।इसलिए,ताउम्र विशाल भारत की विविधिता को नज़दीक से समझने वाले बापू से इस राष्ट्रवाद को भय लगता है। बहरहाल,नरेंद्र मोदी और अब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह खुद बदज़ुबानी के इस सिलसिले को थामने का प्रयास करते नज़र आ रहे हैं,क्या वाकई वह ऐसा कर पाएंगे ? उम्मीद तो नगण्य है लेकिन उनकी पहल को देर आयद दुरूस्त आयद के तौर पर देखा जा सकता है।आगे क्या-क्या होता है देखना दिलचस्प रहेगा।

Saturday, 29 March 2014

अलग-अलग चेहरे,अलग-अलग धर्म।। राजनीति का आधार भी अलग ?


आखिर ये इमरान मसूद कौन है जिसने बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर ज़हरीलेबाण छोड़े।मसूद ने मोदी को जान से मारने तक की धमकी दे डाली। सवाल है कि हिंसात्मक भाषा की राजनीति के जरिये अपने वोट बैंक के वृक्ष को बड़ा करने का औज़ार इसे किसने दिया ? क्या,आप समझते हैं कि एक राजनेता भावनाओं का पुतला है और यूं ही भावनाओं में बहकर कुछ भी कह सकता है ? नहीं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।दरअसल,इनके हरेक कदम के पीछे वोट बैंक की खेती का मुकम्मल इंतज़ाम होता है।भारतीय राजनीति मे धार्मिक ध्रुविकरण कोई नई बात नहीं है।ना ही इमरान साम्प्रदायिक राजनीति का एक नया नवेला चेहरा है।इसकी शुरूआत तो इमरान के जन्म लेने से पहले ही हो चुकी थी।हां,इस राजनीति में इमरान एक कड़ी भर है।ज़रा खुदके दिल से सवाल पूछिएगा क्यों इमरान को इस वक्त मोदी पर ही इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना मुफ़ीद लगा ? क्या सिर्फ़ इसलिए कि मोदी आज देश में एक बेहद लोकप्रिय नेता है (?) नहीं,दरअसल ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मोदी उसी कट्टरवादी राजनीति का प्रतीक है जिस राजनीति को औज़ार बनाकर मसूद सरीखे नेता अपनी राजनीति के भविष्य का पुख़्ता आधार बनाना चाहते हैं।बेशक,दोनों अलग-अलग धर्मों की कट्टर राजनीति के झंडाबरदार बनने का अभिनय करते हो। अभिनय इसलिए क्योंकि, बदलती परिस्थितियों के मुताबिक रथ यात्रा निकालने वाले आडवाणी नीतीश कुमार के लिए धर्मनिरपेक्ष बन जाते हैं।कभी एनडीए में शामिल रहें नीतीश सार्वजनिक मंच पर मोदी की शान में कसीदे पढ़ते नहीं थकते तो वहीं नीतीश मोदी को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताने से गुरेज नहीं करते।और चाहते हैं कि इस खतरे से देश को बचाने के सबसे बड़े नायक के तौर पर उन्हें देखा-समझा जाए।

बदलती परिस्थिति के ही मुताबिक गुजरात दंगों के बाद अपने-अपने आशियाने से उजड़े समुदाय की मौजूदा वास्तविक स्थिति पर मोदी समावेशी विकास का भद्दा मज़ाक करने लगते हैं।देवालय से पहले शौचालय की बात करने लगते हैं।लेकिन,चाहें कितना भी मुखौटा ओढ़ लीजिये आपका मूल ज़ाहिर हो ही जाता है।जब ही खुदकी उदार छवि गढ़ने के खेल में जुटे आडवाणी संघ-भाजपा को समावेशी राजनीति की नसीहतें दे डालते हैं।
लेकिन, जैसे ही आडवाणी मोदी के हिंदुत्व पोस्टर के आगे अपने हिंदुत्व पोस्टर को छोटा पड़ते देखते हैं ठीक तब ही खुदकी पुरानी ज़मीन खिसकने के ग़म में बाबरी पर की गई कार्रवाई पर उन्हें गर्व महसूस होने लगता है।वहीं, गुजरात से निकले मोदी किसी विदेशी पत्रकार को इंटरव्यू देते हैं। इंटरव्यू में सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया जाता है।इस भाषा के जरिये मोदी दंगों के दौरान हुए कत्लेआम पर बड़ी चतुराई से सहानुभूति जताते हैं।वो चतुराई से समझ की एक ऐसी लकीर खींच देते हैं जिसके मायने हरेक शख्स अपने अपने हिसाब से निकाल सकता है।आप चाहें इसे उनका अचानक हुआ ह्द्य परिवर्तन समझिये या फिर दंगों में मारे गए बेकसूरों का उपहास।(कार के नीचे वाला बयान)

क्या वाकई इन अलग-अलग चेहरों की राजनीति  का आधार स्तंभ भी भिन्न-भिन्न रहा है ? 
ऐसा नहीं है कि इंटरव्यू में कही गई मोदी की बात को यूं ही चतुराई का खेल समझा गया।इससे पहले गुजरात में कई दफ़ा वो इस तरह के भाषण देते रहे हैं।हां,अब गुजरात से बाहर निकलकर देश की सत्ता पर काबिज होने की राह पर चल निकले हैं तो हमले गुजरात में दिये जाते रहे भाषणों जितने स्पष्ट नहीं होंगे।भाषण हमारे दो उनके पचीस सरीखे नहीं होंगे।एन दंगों के बाद क्रिया के बदले प्रतिक्रिया हुई जैसे संकेत भी नहीं होंगे।हां,अपनी ज़मीन के मूल आधार का ख्याल रखा जाएगा।वहीं,मोदी को चाहने वाला (एक) बड़ा उन्मादी मानसिकता रखने वाला तबका अपने नेता की रैली के दौरान तख्त पर ये नारा लिये दिख जाएगा- लाल किले के चक्कर में राम को भूल न जाना।ये तबका संघ के अखंड भारत की परिकल्पना पर फूले नहीं समाएगा।उसे अपनी आँखों के बंद होने से पहले पाकिस्तान को सार्वजनिक तौर पर ललकारने वाले अपने प्रिय नेता को उसे दो टूक जवाब देते देखना है।बांग्लादेश और पाकिस्तान को जबरन भारत में मिलाना है।मुल्क के मानचित्र पर भगवा रंग रंगना है।मोदी के स्कूल संघ को भी बॉलीवुड में मुस्लिम चेहरों की बादशाहत पर दाऊद का हाथ दिखता है।इसे साज़िश बतलाकर नाकाम करने के लिए उसे आह्वान करना ही करना है कि राकेश के बेटे को आगे करो।(संघ के मुखपत्र में)

मुसलमानों के सबसे बड़े दमदर्द होने का दावा करने वाले मुलायम उत्तर प्रदेश सरकार के छोटे से कार्यकाल में सौ से ज्यादा दंगों पर इस्तीफा नहीं लेंगे।लेकिन,गुजरात दंगों का विलाप करते अक्सर दिख जाएंगे।अपनी-अपनी छाती का दम भरने वाले ये नेता समाज के बीच दरार पैदा करके अंतत:अपनी राजनीति के एक किनारे पर एक ही हो जाते हैं। इन्हीं सब बातों के बीच मसूद जैसे शख्स को भी अपनी रोटियां सेंकनी हैं।इन कट्टरपंथियों की अवसरवाद के सिवा दूसरी कोई कौम नहीं है।एक दूसरे से उर्जा लेकर आमजन से जुड़े मुद्दों के बगैर राजनीति करना इन्हें आसान लगता है।न कोई ख़ास जद्दोजहद,संघर्ष बस नारों,आह्वानों,बेगुनाह कार्यकर्ताओं और आम लोगों की लाशों के बीच गिद्ध अपना पेट भर लेते हैं।

Tuesday, 28 January 2014

व्यक्ति की जय-जय,व्यक्तित्व की क्षय-क्षय ।



पिछले दिनों दक्षिण अफ्रीका ने अपने प्रकाशमान ज्योतिपुंज 'नेलसन मंडेला' को खो दिया । अन्याय के खिलाफ़ लामबंद होने वाले मंडेला का जाना स्वभाविक तौर पर विश्व के लिए क्षति है।इस क्षति पर दुनियाभर के नेताओं ने शौक़ प्रकट किया । हाल में गांधीजी की पुण्यतीथि पर उन्हें याद किया।लेकिन,सवाल ये है कि शौक़ाकुल नेताओं-आम जनमानस ने मंडेला और गांधी जैसे महापुरूषों से क्या सीख ली ? क्या महात्मा गांधी के गुज़र जाने से लेकर आज मंडेला तक हमारे दोहरे चरित्र अख्तियार करने के रवैये में कोई ख़ास अंतर आया ? कभी-कभी यह देखकर मन आक्रोशित हो जाता है कि काले रंग को बतौर कालीख किसी का अपमान करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने वाले भी शौक़ जता कर अपनी नौटंकी करने से बाज़ नहीं आते । नस्लभेद के खिलाफ़ विरोध का प्रतीक बने नेलसन को श्रद्धांजलि अर्पित करने में कुछ ग़लत नहीं है पर क्या ऐसा करते वक़्त हम अपनी कारगुज़ारियों पर आत्ममंथन करते हैं ? जब इन्हीं सब बातों के बारे में सोच रहा था तब ही एक अजीब घटना से रू-ब-रू हुआ । साकेत मेट्रो स्टेशन पर जैसे ही शेयरिंग ऑटो में बैठा तो देखा कि किसी अफ्रीकी के आने पर साथ बैठी सवारियां नाक-भौं सिकोड़ने लगी । अपनी ही जैसी रंगभेदी मानसिकता को समझते हुए ऑटो चालक ने भी उस काले अफ्रीकी को पर्याप्त जगह न होने का बहाना बनाकर हाथ जोड़ दिए । इतना ही नहीं इससे ज्यादा ख़तरनाक घटना कुछ महीनों पहले दिल्ली के खानपुर में मौजूद दुग्गल कॉलोनी में हुई । एक बच्चे के गायब हो जाने के बाद कुछ शुरूआती पूर्वग्रहों के आधार पर समझा गया कि बच्चे को अफ्रीकी उठा ले गए । इस घटना के बाद अफ़वाह आग की तरह वारदात की जगह के आसपास वाले इलाकों में फैल गई और कुछ दबंग किस्म के स्थानीय लोगों ने इलाके के तमाम अफ्रीकियों को चुन-चुनकर घर से निकालकर उन पर हमले करना शुरू किया । जब मामला ख़तरनाक झड़पों में तब्दील होने लगा तब पुलिस ने नियंत्रण करना शुरू किया । कुछ वक़्त बाद पता चला कि पास ही के इलाके में रहने वाला एक स्थानीय शराबी बच्चे को नशे में उठाकर ले गया था ।  फिर हाल में बदलाव की वाहक बनी आम आदमी पार्टी का अपने मंत्री सोमनाथ भारती के मामले में बचाव करना बेहद निंदनीय है । मुमकिन है,जैसा सोमनाथ बता रहे थे वैसा कुछ हो भी रहा हो जिससे स्थानीय लोग कम से कम उनके समर्थन में हैं। लेकिन, यह नाकाबिले यक़ीन लगता है कि आम आदमी पार्टी में शामिल योगेंद्र यादव,अरविंद केजरीवाल समेत अन्य नेताओं को यह समझ नहीं आया कि इस कार्रवाई की मंशा चाहे नेक रही हो लेकिन इससे जो संदेश आवाम में गया वो ग़लत था। एक आदर्शजनप्रतिनिधि होने के नाते सोमनाथ को इस मुआमले में अतिरिक्त सतर्कतता बरतनी चाहिए थी ।


यह तो ऐसी घटनाएं हैं जिन्हें साफ़ तौर पर देखा और समझा जा सकता है लेकिन मानसिक तौर पर रंग,लिंग,नस्ल,जाति,धर्म के आधार पर बरते जाने वाले भेदभाव का क्या । किसी सुंदर गोरी लड़की के ज्यादा विवेक सम्मत,बौद्धिक होने पर हैरानी जताना और सांवली लड़की के ऐसे ही विवेक को सामान्य समझना इसी मानसिक विकृति की एक कड़ी भर है । यहां समझा जाता है कि गोरी लड़की मॉडलिंग में ही माहिर हो सकती हैं जबकि सांवली-काली लड़की सुंदर नहीं होती । शर्मनाक बात ये कि रंग,लिंग,नस्ल,जाति,धर्म के आधार पर नफ़रत और भेदभाव का सिलसिला उस भारत में ही इतना लंबा और विस्तृत है जो महात्मा गांधी को अपना राष्ट्रपिता मानता हैं और कहा जाता है कि गांधी ही नेलसन की प्रेरणा थे । हम अक्सर तंज कसते हुए महात्मा गांधी को मजबूरी का नाम बतला देते हैं । जबकि, सच्चाई तो ये है कि वो मजबूरी नहीं मजबूती का नाम थे । उनकी कथनी और करनी में कभी अंतर नहीं रहा । मुल्क के ऐसे हालात देखकर निश्चित ही गांधी भी बेहद निराश होते होंगे । जिस गांधी ने धर्म के नाम पर हो रहें दंगों पर अद्भूत और असधारण तरीके से क़ाबू पाने में कामयाबी हासिल की और धार्मिक सद्भाव का ऐसा माहौल बनाया कि मुसलमानों के त्योहार पर मस्जिद के बाहर हिंदू उनका स्वागत करते । उसी के देश में मंदिर-मस्जिद के नाम पर इंसान-इंसान के खून का प्यासा हो उठा । जिस कांग्रेस को गांधी ने अपने खून-पसीने से सींचा उसी के रहते दिल्ली में प्रधानमंत्री की हत्या करने वाले उनके अंगरक्षकों की वज़ह से पूरी की पूरी कौम को निशाना बनाया गया । जिस राज्य में उनका जन्म हुआ था नफ़रतों की आग ने 2002 में उस गुजरात को भी नहीं बख़्शा और यहां भी धर्म के आधार पर भयानक नरसंहार हुआ । फिर हाल ही में दंगों की आग से आज़ादी के बाद से महफूज रहने वाले मुजफ्फरनगर के दंगे तो नफ़रतों की एक और कड़ी  है जिसमें कुछ लोगों के निजी विवाद को शातिराना तरीके से धार्मिक रंग दे दिया । धार्मिक आधार पर विभाजन की त्रासदी ये कि हिंदू-मुसलमान को और मुसलमान हिंदू को किराये पर मकान नहीं देते । एक को लंबी दाढ़ी खलती है तो दूसरे को तिलक । मालूम नहीं हम कब नेलसन मंडेला और गांधी सरीखे महान पुरूषों की  तस्वीरों को पूँजने की जगह उनके सिद्धांतों-आदर्शों को जीने की भी कोशिश करेंगे । 

Tuesday, 19 November 2013

संगठन बनाम सरकार (भाग-2)


इस तकरार का सिलसिला वैचारिक मतभेद तक ही नहीं बल्कि उससें भी आगे भीतरी क्षेय-मात तक जा पहुंचता है  -


इन सब पैंतरेबाज़ियों के बाद पीएमओ में एक ऐसे आईएएस अफसर की नियुक्ती हुई जो गांधी परिवार के बेहद करीबी और अज़िज हैं |उत्तर प्रदेश काडर के आईएएस पुलक चटर्जी को प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रधानसचिव नियुक्त किया गया | पुलक चटर्जी उत्तर प्रदेश के रायबरेली में भी तैनात रह चुके हैं| चटर्जी सोनिया गांधी के स्पेशल ड्यूटी अधिकारी के रूप में भी काम कर चुके हैं | इतना ही नहीं,वे राजीव गांधी फाउंडेशन के लिए भी काम कर चुके हैं | इनसे पहले या कहे सीधा मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के समय से ही (2004)टीके नायर प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रधानसचिव कार्यरत रहे हैं |अब वह बतौर पीएम के सलाहकार कार्यरत हैं | बहराल,माना जाता है कि माना जाता है कि इस वक्त पुलक पीएमओ के जरिए राहुल के लिए रोडमैप बनाने में जुटे हैं |कई हालिया प्रकरण तो इसी बात की तस्दीक करते हैं कि कांग्रेस गांधी परिवार के लाडले को देश का प्रधानमंत्री बनते देखना चाहती हैं लेकिन पार्टी के भीतर कई तरह के सवाल ऐसा करने से उसे रोके हुए हैं|हाल में गुजरात के मुख्यमंत्री और बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता कहीं न कहीं कांग्रेसी खेमे में सीधा खुलकर राहुल को प्रोजेक्ट करवाने में एक खेमे के लिए बाधा बनी हुई है| इस खेमे की राय में राहुल को आगे करके भी पार्टी ने मुंह की खाई तो उनके राजनीतिक भविष्य पर विराम लग जाएगा और कांग्रेसी इस बात को भलि-भांति जानते है कि गांधी परिवार के बिना कांग्रेस का भविष्य क्या है | हालांकि,कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट में जिस तरह से प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के साथ में उनकी तसवीर आती है उससे तो यहीं लगता है कि राहुल को लेकर पार्टी के भीतर माहौल पूरी तरह से बनने के कगार पर है|अब सारा खेल बस इस बात पर आ कर अटक जाता है कि किस तरह से मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुई लानत-मलामत से बचा जाए और बाहर यह संदेश दिया जाए कि राहुल के नेतृत्व में सरकार यूपीए-1 और यूपीए-2 से बेहतर काम करेगी |उसी कवायद के तहत राहुल सरकार की शिक्षा,भूमि,अकाश,अध्यादेश सरीखी नीतियों और फैसलों पर विरोधी स्वर अख्तियार करने नज़र आते हैं | जयपुर चिंतन शिविर को हुए ज्यादा समय नहीं गुज़रा जहां कांग्रेसियों की भाषा का मजमून राहुल को सिंहासन पर बैठाया जाने तक सीमित था | इसी चिंतन शिविर में प्रधानमंत्री के आगमन पर इतना उत्साह नहीं दिखा जितना राहुल के आने पर दिखा |हालांकि,प्रधानमंत्री अक्सर अपने तीसरे कार्यकाल को लेकर पूछे गए सवाल से बचते रहे थे लेकिन पिछले कुछ समय से वो राहुल को आगे बढ़ाने की वकालत करते नज़र आ रहे हैं | जैसे, 7 सितम्बर को सैंट पीटर्सबर्ग में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन से वापस स्वदेश लौटकर उन्होंने कहा था कि राहुल पीएम पद के आदर्श व्यक्तित्व हैं|उनके नेतृत्व में काम करके उन्हें अच्छा लगेगा | दरअसल यह बयान मनमोहन सिंह की ओर से गांधी परिवार के प्रति भक्ति –भाव को महज़ ऊपरी तौर पर दिखाता है लेकिन राजनीति में कालीन से ज्यादा कालीन के नीचे छुपी धूल का महत्व होता है|गौर करने पर मालूम चलेगा कि मनमोहन सिंह ये भक्ति भाव ऐसे समय दिखा रहे थे जब खुद राहुल पार्टी और सरकार में कई मर्तबा पीएम पद की दावेदारी को लेकर बात न करने की नसीहतें दे चुके थे|राहुल के रणनीतिकार उन्हें धीरे-धीरे पर्दे पर लाने के पक्ष में हैं | इसके पीछे उनका मत एकदम से राहुल को प्रोजेक्ट करके आम चुनावों से पहले गुब्बारे में सुई चुबाकर उसे फुस करने से बचाना है | मसलन,वह जानते है कि आज जनता के मिजाज़ की लहर कांग्रेस और सरकार विरोधी ही चल रहीं है और राहुल फिलहाल वो करिश्माई ताक़त नहीं रखते जिससे वो इसका रूख दूसरी तरफ़ मोड़ सकें |इसलिए कांग्रेस,मनमोहन के  बाद खाली होने वाली जगह और विपक्ष द्वारा साम्प्रदायिकता से बचाने के लिए एक कारगर हथियार के रूप में उनको धीरे-धीरे पर्दे पर पेश करेगी|जिससें राहुल गांधी की जनता के बीच बनी पप्पू छवि को बदला जा सकें|     

संगठन बनाम सरकार ?

पिछले दिनों देश की राजनीति में भूचाल सा आ गया दागी जनप्रतिनिधियों के लिए लाए गए अध्यादेश पर कांग्रेस उपाध्यक्ष एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कुछ ऐसे पेश आए जैसे वह विपक्ष की भूमिका निभा रहे हो | उनके इस तरह अचानक अवतरित होने से  कांग्रेस को क्या नफ़ा हुआ और सरकार को क्या नुकसान इसकी तह में जाने के लिए कुछ सवालों के जवाब ढूंढना ज़रूरी हो जाता है| सवाल ये  हैं कि कांग्रेस उपाध्यक्ष ने जिस भाव-भंगिमा और भाषा शैली के साथ सरकार के अध्यादेश की आलोचना की क्या यह घटनाक्रम सरकार बनाम संगठन के बीच दरारों को ज़ाहिर करता है ? या फिर,मिस्टर क्लिन की छवि खोते मनमोहन और विश्वनीयता के संकट से जूझती उनकी सरकार से संगठन को अलग दिखाने की सोची-समझी कवायद भर है ? दोनों सवालों में यहां सरकार बनाम संगठन के बीच दीवार खड़ी होने की एक लंबी पृष्ठभूमि है जिसके बारे में बात करना मनमोहन सिंह की जी हुजूरी वाली छवि के भ्रम को तोड़ता है| दागी जनप्रतिनिधियों को लेकर लाया गया अध्यादेश कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक के बाद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट के पास पहुंचा था | कांग्रेस कोर ग्रुप की अध्यक्षता खुद सोनिया गांधी करती हैं | फिर सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस उपाध्यक्ष को इस अध्यादेश की जानकारी नहीं थी जिसे उन्होंने बकवास करार दिया |इससे पहले विधेयक पर भी अगर वह चाहते तो जनता के समक्ष अपने विचार ज़ाहिर कर सकते थे| माना जा रहा है कि विधेयक से अध्यादेश लाने के दौरान चुप्पी साधे रखने वाले राहुल और उनकी युवा बिग्रेड तब सक्रिय हो गई जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अध्यादेश पर अपनी सांकेतिक आपत्ति जताई | ऐसे में युवा नेताओं ने राहुल को ज़मीनी धरातल पर इस अध्यादेश के खिलाफ़ बन रहे माहौल से उन्हें परिचित करवाया और उन्हें चेताया कि इस ग़लत फैसले का फायदा भाजपा को मिल सकता है| तब उनके ऑफिस 11 तुगलक रोड पर अध्यादेश का विरोध करने की स्क्रिप्ट लिखी गई |  और साथ ही साथ उन्होंने पीएम को पत्र लिख दिया | पत्र पहले पीएमओ को सौंपा गया फिर फैक्स के माध्यम से वॉशिंगटन गए प्रधानमंत्री को|यहां सवाल उठता है कि क्या राहुल कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाकर अध्यादेश के खिलाफ़ प्रस्ताव नहीं ला सकते थे ?(ज़ाहिर तौर पर जिसके बाद कांग्रेस के प्रवक्ताओं को यह समझा दिया जाता कि इस अध्यादेश वापसी का श्रेय कैसे राहुल को देना है)ऐसा करने से सरकार की लाज भी रह जाती और राहुल की पप्पू छवि जनता के मसीहा के रूप में भी पेश की जा सकती थी|सवाल यहां यह भी है कि  क्या वो प्रधानमंत्री के अमेरिकी यात्रा से आने का इंतज़ार नहीं कर सकते थे ? पहली नज़र में देखें तो उनका  ये कदम डैमेज कंट्रोल की रणनीति नज़र आएगा लेकिन उनकी भाषा शैली और राजनीति में सबसे अहम स्थान रखने वाले वक्त पर गौर किया जाए तो इससें यह भी समझ आ जाता है कि ऐसा करके पार्टी ने मनमोहन सिंह को साफ़ संदेश दे दिया है कि अब आगे की कमान राहुल संभालेंगे | 


दरअसल,प्रधानमंत्री ने जब वॉशिंगटन से लौटते वक्त राहुल के बयान पर प्रतिक्रिया दी तो उनके बयान के कई निहितार्थ निकाले जा सकते हैं | उन्होंने कहा - हम देखेंगे कि हवा का रूख किस तरफ़ हैं और इस बात की तह तक जाने की कोशिश करेंगे की राहुल ने ऐसा क्यों और किस लिए कहा? हवा का रूख किस तरफ़ है से प्रधानमंत्री का क्या मतलब था ? क्या वह यह कहने की कोशिश कर रहे थे कि वह अध्यादेश को लेकर सरकार में  विचार-विमर्श करके ही आगे की रणनीति तय करेंगे बजाय गांधी परिवार के हुकूम पर हामी भरने के?  राहुल ने ऐसा क्यों कहा से क्या वह यह बताना चाह रहे थे कि राहुल ने जिस तरीके से विरोध जताया उसकी जानकारी पहले उन्हें क्यों नहीं दी गई ? जानकारों की माने तो पार्टी के भीतर यह विचार मजबूती से पकड़ बना रहा था कि प्रधानमंत्री की छवि अब धूमिल हो चुकी है।जबकि,राहुल ही पार्टी के लिए एकमात्र ऐसे हथियार हैं जिनके दम पर पार्टी आगे का कारवां तय कर सकती है| शहरी मध्यवर्ग में युवाओं के भीतर भ्रष्ट और आपराधिक नेताओं के खिलाफ़ ख़ासा रोष है जिसकों इस बगावती रणनीति के तहत राहुल ने भुनाने का प्रयास किया |  

अब सवाल उठता है कि क्या मनमोहन सिंह गर्दन झुकाए हर वो काम करने को तैयार हैं जो दस जनपथ चाहें ?  क्या मनमोहन सिंह आज भी वहीं मनमोहन सिंह हैं जो यूपीए -1 का कार्यकाल संभालते वक्त थे और जिस वज़ह से सोनिया ने उन पर भरोसा जताया था |  याद रहें कि इतना सब बवाल होने के बावजूद इस्तीफा नहीं दूंगा कहने वाले ये वहीं मनमोहन हैं जो इस्तीफा देने पर तब अड़ गए थे जब राजीव गांधी ने योजना आयोग के सदस्यों को बंच ऑफ जोकर कह दिया था ( जी सी सोमाया की किताबदी आनेस्ट स्टैंड अलोन में देखें) राजनीतिक पंडितों की माने तो यूपीए-1 से यूपीए-2 के कार्यकाल के दौरान मनमोहन सिंह में ख़ासा परिवर्तन आए |(पत्रकार अभय कुमार दुबे के अनुसार पिछले एक दशक में राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी मनमोहन सिंह ही हैं)सरकार की कामयाबी के लिए गुलदस्तें दस जनपथ और नाकामयाबी के लिए आलोचनाओं का ठिकरा उनके सर फोड़े जाने से वो खीझ खाने लगे|

(कहते हैं तसवीर बिना कुछ बोले बहुत कुछ कह जाती हैं लेकिन कभी-कभी तसवीरें वही कहती हैं जो हम उससें कहलवाना चाहते हैं)
फिलहाल, संगठन बनाम सरकार का खेल समझने के लिए हम दो स्तरों पर आकलन कर सकते हैं एक वैचारिक भिन्नता जो मतभेद से मनभेद की शक्ल में तब्दील हुई|दूसरा सोची समझी रणनीति के तहत एक दूसरे को पटखनी देना | पहले बात करते हैं, वैचारिक मतभेद की जो मनभेद में बदलते गए|आपको याद होगा मनमोहन सिंह का वह विवादास्पद बयान जिसमें उन्होंने देशवाशियों को समझाया था कि पैसा पेड़ पर नहीं उगता|इसी क्रम में इस बार वह कह गए थे कि बेशक मरेंगे लेकिन कुछ करके | मनमोहन और वित्त मंत्री पी.चिदंबरम वकालत कर रहे थे प्रत्यक्ष बहुब्रांड खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश की | माना जाता है कि एक लाख तीस हज़ार करोड़ के खाद्य सुरक्षा बिल को अपना ड्रीम प्रोजेक्ट बताने वाली यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी एफडीआई पर सख़्ती से आगे बढ़ने को लेकर असमंजस में थी वह चाहती थी कि इस बड़े फैसले पर तमाम घटकों को विश्वास में लिया जाए | जहां,तृण्मूल कांग्रेस प्रमुख और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लगातार दस जनपथ के जरिए मनाने की कोशिशें चल रहीं और पार्टी महासचिव जनार्दन द्विवेदी उन्हें अपना एक बहुमूल्य सहयोगी बता रहे थे वहीं प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री करो या मरो जैसी सख्त बयानी कर रहे थे | 14 सितम्बर 2012 को जब ममता ने समर्थन खींच लेने की धमकी दी तो 21 तारीक तक का अल्टीमेटम इस शर्त पर दिया गया कि खुद प्रधानमंत्री इस फैसले पर उन्हें विश्वास में लेंगे| सूत्रों का कहना है कि यह आश्वासन उन्हें खुद कांग्रेस और यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी ने दिया लेकिन प्रधानमंत्री ने ममता को मनाने की कोई कोशिश नहीं की |जिसके चलते यूपीए को अपना एक महत्वपूर्ण सहयोगी गंवाना पड़ा |यहां तक की प्रधानमंत्री का पैसा पेड़ पर नहीं उगता वाला बयान देशवाशियों को कम और सोनिया के जनहितकारी  ड्रीम प्रोजेक्ट खाद्य सुरक्षा बिल पर व्यंग्य ज्यादा था |एफडीआई और खाद्य सुरक्षा बिल से इतर  भूमि अधिग्रहण विधेयक पर भी कांग्रेस और सरकार के बीच कई मतभेद थे जिसमे राहुल गांधी ने अपनी सोच को ग्रामीण विकास मंत्री जयराम-रमेश के जरिए लागू करवाया | 


मनमोहन सरकार की साफ़ सफ़ेद छवि पर काला धब्बा बन चुके कोयला घोटाले और रेलवे बोर्ड नियुक्ति मामले में जब क्रमश पूर्व केंद्रीय मंत्रियों अश्विनी कुमार और पवन कुमार बंसल पर सवाल उठने लगे तब यह बात मुख्यधारा के मीडिया में भी सूर्खियों का विषय बन चुकी थी कि इस्तीफे में देरी के चलते कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पीएम से कड़ी नाराज़गी जताई | दस जनपथ उस समय भ्रष्टाचार विरोधी माहौल की आँधी में इन दो मंत्रियों की वज़ह से अपनी साख पर बट्टा लगवाने के पक्ष में नहीं था | जबकि, पीएम दोनों मंत्रियों के बचाव में थे | इसलिए,तमाम किरकिरी के बावजूद उन्होंने इस विवाद के तीन महीने बाद अगस्त 2013 को अपनी जापान यात्रा के लिए विशेष दूत के रूप में अश्विनी को नियुक्त कर लिया | पिछले साल जहां केंद्र सरकार ने एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी की वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने सरकार का खुलकर विरोध किया|परिणामस्वरूप. रसोई गैस की संख्या बढ़ा दी गई | इससे पहले, अमेरिकी परमाणु करार के दौरान भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विश्व बैंक और अमेरिका का एजेंट तक बतला दिया गया | दरअसल,इस करार की वज़ह से सोनिया सरकार की किरकिरी करवाने के पक्ष में नहीं थी लेकिन मनमोहन आगे बढ़े और संसद में नोटो की गड्डी वाला वह दिन इतिहास के काले पन्नों में दर्ज हो गया |  

Thursday, 3 October 2013

बीमारों का मसीहा !


साल 2008 था लक्ष्मी नगर में दिल्ली और भी आधुनिक होने के कगार पर थी कि निर्माणधीन मेट्रो स्टेशन का पीलर गिरने से दो मजदूरों की मौत हो गई तो चौदह बुरी तरह जख़्मी हो गए|मीडिया के कैमरा से लेकर सड़क से गुज़रते लोग ठहर कर इस दर्दनाक मंज़र को देखने लगे..हर तरफ से चीखपुकार की आवाज़ दिल को दहला रही थी.. घायल हुए मजदूर मदद के लिए करहा रहे थे |कुछ देर बाद उन्हें गुरू तेग बहादुर अस्तपाल ले जाया गया जहां जिस तरह का उपचार उन्हें मिला उसमे कई तरह की कई कारणों से खामियां थी..  जैसे, ज़रूरत की हर दवा का वहां मौजूद न होना,घायलों में ज्यादातर लोगों का गरीब तबके से होना,मीडिया की सक्रियता की वजह से हादसे में घायलों की संख्या कम दिखाना| इन सब बातों ने मेरी ज़िंदगी ही बदल कर रख दी.. ऐसा कहते हुए  कुर्सी पर बैठे एक राष्ट्रीय दैनिक अख़बर की कतरन में खुद की तस्वीर देखते हुए 'केसरिया रंग' की कमीज पहने 'ओमकार नाथ' मेरी ओर देखकर सवाल करते हैं कि घर में जब कोई दवा काम की नहीं रहती उसका क्या करते हो.. किसी गरीब को देते हो ?मुंह को न की मुद्रा में हिलाता हूं तो वो आगे कहते हैं बस ये ही मैं करता हूं.. जो दवा काम में नहीं आ रही होती उन्हें लेकर ज़रूरतमंदो को देता हूं.. वो आगे कहते हैं की दस साल की उम्र से चलने में सक्षम नही हूं फिर भी हौसलें किसी से कम नहीं.. आज सब मुझे प्यार से मेडीसिन बाबा के नाम से बुलाते हैं.. अपने इस अलग किस्म के प्रयास को याद करते हुए बाबा बताते हैं कि शुरूआती दौर में जब वो कोठियों में दवा मांगने जाते थे तब बाहर खड़े गार्ड उन्हें भगा देते थे,गलियों से "इस्तेाल में न आने वाली दवा दें दो" बोलते-बोलते जब वो गुज़रते थे तो लोग उन पर शक करने के साथ उन्हें भिखारी तक कह देते पर छ:साल के इस सफ़र ने आज समाज में उन्हें एक अलग मुकाम पर पहुंचा दिया|अब लोग बिन मांगे उनकी मदद करने को आगे आते हैं|अपना एक थैला खोल कर वो विदेश से आ रहीं दवाओं के पार्सल भी दिखाते हैं जिसमें हाँग काँग से लेकर इंगलैंड तक से आई मदद का पता चलता हैं



ये सचमुच सरहानीय हैं कि बाबा दिल्ली भर के अलग-अलग सरकारी अस्तपतलों में जा कर ज़रूरतमंद मरीजों को छाट उनके डॉक्टरों से समन्वय स्थापित कर उनकी मदद करते हैं और काम में आने वाली दवा उपलब्ध न होने पर भी अगले दिन इंतज़ाम कर लाने का वादा करते हैं|बाबा ने दवा इक्कट्टी करने के लिए एक कमरा किराए पर भी ले रखा हैं जिसका वो लगभग दो हज़ार रूपय किराया देते हैं,यही पर एक छोटा फ्रीज भी मौजूद हैं जो गूँज नाम के एक गैर सरकारी संस्थान ने उन्हें दिया|दवाओं पर लेबल देखने के लिए बाबा ने तकरीबन चार सौ आतशी शीशें भी अपने पास रखे हैं|एक वकील ने उन्हें सलाह दी कि इस तरह से दवा जमा करने से छापा भी पड़ सकता हैं इसी वजह से उन्होंने डॉक्टर एसएल जैन राजेंद्र नगर और नसीम मतिया महल जैसे कई अस्पतलों से करार भी किया और उन्हें वक़्त-वक़्त पर निरीक्षण के लिए बुलाया|हफ्ते में चार दिन दूसरों के अभावों को दूर करने की खातिर सुबह से रात तक दवा इक्कट्टी करने वाले बाबा खुद पहले तेरह साल तक एक बल्ड बैंक टेक्निशीयन थे|आज पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी के साथ-साथ समाज के हाशिए पर धकेल दिए गए वर्ग के लिए भी वो प्रयासरत हैं|घर में जब बाबा से बात हो रही थी परिवार के बाकी सदस्य बाहर गए थे सिवाय नाति के जिसे अपने नाना पर बहुत गर्व हैं|शाहरूख कहता हैं कि इस उम्र में जब सबके नाना घर में बैठ जाते हैं मेरे नाना इतना नेक काम कर रहे हैं|बाबा के पास रखा एक दवा का बक्शा खोल शाहरूख बताता है कि बक्शें में एक रूपय की सर दर्द की दवा से लेकर कैंसर तक की दवा उपलब्ध हैं| जिसके बाद बाबा कहते हैं कि दवा तो और महंगी भी हैं पर अभी भी काम करने के लिए काफ़ी ज़रूरतें हैं जिसमे एक मेहनतकश टीम सबसे पहली ज़रूरत हैं|




ओमकार नाथ (मेडिसिन बाबा)



बाबा कहते हैं मैं लोगों से कहूंगा महीने में तीस दिन खुद को देते हैं कम से कम एक दिन समाज को भी दीजिए.. नहीं कहता मुझे दीजिए खुद निकलें घरों से बाहर और देखे मुफलीसी कहीं न कहीं आपका सर शर्म से झुकाने को मौजूद होगी|हां,आपको बहुत चीज़े ऐसा करने से रोकेंगी जैसे मुझे भी शुरूआत में मेरे ही परिवार में मेरी पत्नी ये कहकर रोकती थी कि ये मांगना ठीक नहीं पर जिस दिन नव भारत में मेरी तस्वीर छपी उसने भी कहा कि ज़रूर मैं कोई अच्छा काम कर रहा हूं|अब घरवाले खुद मुझे टीवी पर देखते हैं तो खुश होते हैं मुझे भी स्टूडियो में जाने पर मालूम चला कि वहां पाउडर लगाकर बैठना पड़ता हैं|इस बीच बाबा को एक फोन आया मालूम हुआ कि उन्हीं के मौहल्ले में किसी बच्ची की तबीयत ख़राब हैं जिसके लिए उन्हें पास के ही एक अस्पताल जाना होगा|उस रोज़ उनकी खुद की तबीयत न ठीक होने के बावजूद उन्होंने फोन पर वादा किया कि वो अभी सीधा अस्तपताल पहुंच रहे हैं मेरे पूछने पर कि आप कैसे जाएंगे उन्होंने अपने सफ़ेद पड़ चुके बालों पर हाथ फेरते हुए,झुरियां पड़ चुकी आँखों से मेरी ओर देख कहा बीटियां कहेगी बाबा ज़रूरत पड़ने पर नहीं आया.. मुझे जाना होगा बेटा.. और मैं यह देख चकित था कि एक ऐसे समय में जब भाई-भाई का नहीं,पुत्र पिता का नहीं,खून-खून का नहीं.. पचास से ऊपर की उम्र के ये बुजुर्ग जिनके खुद के इक्कतालिस वर्षीय पुत्र मानसिक तौर पर बीमार हैं समाज के लिए जी-जान से अपने खून का कतरा कतरा देने को तैयार हैं|ओमकार जी का मेडीसिन बाबा बनना इसलिए भी काब़िले तारीफ हैं चूंकि विश्व स्वास्थ संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 649 नागरिकों की दवाओं तक कोई पहुंच नहीं|ऐसे में बाबा पांच से दस लाख रूपय की दवाएं समाज से मिल रही मदद और अपनी कमीज पर लिखे अपने मोबाईल नंबर 9250243298 के जरिए एकत्रित कर इसे बारह दानशील अस्पतालों तो दो सरकारी अस्पतालों में दे रहे हैं| यदि,आज मनोज कुमार रोटी,कपड़ा,मकान, का अगला भाग बनाते तो ज़रूर इस कड़ी में दवा भी जोड़ते|