Tuesday, 6 January 2015

पीके पर विमर्श का रॉन्ग नंबर ।

अलसुबह दफ़्तर से घर की ओर जा रहा था।गली में भगवा वस्त्र पहने बाबा अचानक से टकरा गए।माथे पर बिना रज़ामन्दी के टीका लगा दिया और शनि का प्रकोप दिखाकर रूपये ऐंठने की कोशिश करने लगे।अपने झोले से सांप निकाल पैसे उस पर छुआने को कहा।मैंने मना किया तो ठग बाबा गुंडागर्दी पर उतारू हो गए।अभी तक कृपा का स्त्रोत सांप भय पैदा करने का ज़रिया बन चुका था।उसे मेरे नज़दीक ला कर वह खुलेआम गुंडागर्दी करने लगे।भला हो नज़दीक खड़े एक जानकार का जिनके शोर मचाने से ठग बाबा की हवा निकल गई और झोले में रखे पैसे वो वापस हाथ में थमाकर फौरन रफ्फूचक्कर हो लिए।यह घटना मेरे लिए इसलिए भी चौंकाने वाली थी क्योंकि कुछ समय पहले एकदम ऐसी ही घटना का सामना कर चुका था।यह अनुभव इसलिए साझा किया क्योंकि हाल में अंतरिक्ष से आए पीके पर ख़ूब बवाल मचा है।पीके से मुलाक़ात के दौरान मुझे भी अपने पर यहीं गुज़री याद आ गई थी।दूसरी दुनिया का यह सिनेमाई किरदार पृथ्वी पर आता है और यहीं से कहानी की शुरूआत होती है।कहानी के शुरूआती कुछ भाग से ही समझा जा सकता है कि इसका उद्देश्य धर्म,आस्था के नाम पर चलने वाले ठगी के विशाल साम्राज्य पर हल्ला बोलना है।पीके रोजमर्रा की ज़िंदगी में चल रही कुछ गतिविधियों पर हमारी ख़ामोशी के बीच शोर मचाता है।पीके सवाल पूछता है कि जिस ऊपर वाले को दुनिया का रचियता कहा जाता है उसे अपने ही बच्चों से जुड़ने के लिए धर्म के ठेकेदारों की ज़रूरत क्यों होगी ? (पीके इन्हें मैनेजर कहता है)

उदाहरण के तौर पर शिरडी के साईं हमेशा अपने फक़ीराना अंदाज़ के लिए पहचाने गए । आज उनके मैनेजरों ने इसी फकीर साईं को शाही ठाट-बाट का प्रतीक बना डाला है।कहा जाता है कि साईं अपने जीवनकाल में भीक्षा से ही खानपान का बंदोबस्त करते थे।यह साईं कैसे हो सकते हैं जो करोड़ों की भेंट लेते हैं,सोने के सिंहासन पर विराजमान हैं, बेहिसाब धन-दौलत के जाल में फंसकर मुफलिसी के अँधकार में डूबे अपने बच्चों के साथ भेदभाव करते हैं।मसला सिर्फ़ दान का नहीं बल्कि इसके आधार पर बरते जाने वाले दोहरे मापदंड से है।यह रॉन्ग नंबर नहीं तो क्या है जहां उनके भक्तों की सामाजिक,आर्थिक हैसियत साईं के दर्शन के लिए पहला पैमाना होता है।सम्पर्कों और धन दौलत वालों के लिए ख़ास वीवीआईपी सुविधाएं हैं।साधारण आदमी यहीं लम्बी कतारों के मार्फ़त दोयम दर्जे का व्यवहार पाता है।



पीके जितना हमारी तरह दिखता था सोचता उतना ही जुदा था




ज़ाहिर है कि करोड़ों और अरबों का व्यापार कर रहे ठगों को पीके से एतराज़ होना था।एक स्वामी शंकराचार्य स्वरूपानंद का बयान आया और मुख्यधारा का मीडिया फिल्म पर अपने विवेकानुसार बहस छेड़ने के बजाय उनके एजेंडे पर अमल करते हुए बहस का दरबार सजा बैठा।किसी ने पीके के सवालों का जवाब नहीं मांगा।स्वभाविक तौर पर वह इन सभी सवालों के जवाब दे भी नहीं सकते थे।इसलिए,चर्चा के मुख्य विषय वस्तु मुसलमान(ख़ासकार आमिर के चलते) और इस्लाम तक निपटा दिये गए।कितना बेहतरीन रहता अगर पीके के सवालातों के आधार पर भी चर्चा होती।आस्था,धर्म के नाम पर चल रहे गोरखधंधे,भिन्न-भिन्न धर्मों के बीच ग़लतफ़हमियां उत्पन्न कर नफ़रत पैदा करने वाले सोच पर चर्चा होती,हालिया घटनाओं के ज़रिये बाबागीरी में अपराधीकरण के बोल बाले पर भी बात होती । यह सब सवाल सत्ता,धर्म और पूंजी के गठजोड़ ने बेहद गौण कर दिये । फिल्म को हिंदू धर्म के खिलाफ़ षड्यंत्र बताने वालों में अधिकांश ने शायद यह फिल्म देखी तक नहीं । कुछ टिप्पणी करने की रस्म अदायगी पूरी करने के लिए भी सुनी सुनाई और दूसरों की लिखी जा रही बातों के आधार पर अपने विचार व्यक्त करने लगे । जबकि,असलियत ये है कि फिल्म में भारत जैसे विविधितापूर्ण देश के लिहाज़ से सभी धर्मों को शामिल किया गया है।अपनी एक तयशुदा सीमा के कारण किसी पर कम तो किसी पर ज़्यादा व्यंग्य अथवा कटाक्ष किये गए । ऐसा कहते हुए हमें देश की बहुसंख्यक आबादी और उसी के हिसाब से बाज़ार की ज़रूरत को भी समझना होगा ।

अफ़सोस कि फिल्म पर हुए सार्वजनिक विमर्श का संकुचित दायरा कट्टरपंथियों के लिए ध्रुवीकरण का औज़ार बन गया।बिना किसी ठोस आधार फिल्म को इस्लाम बनाम हिंदुत्व का मंच बनाया गया।हालांकि,मुख्यधारा के मीडिया में चल रहे विमर्श से ऐसे सतही विमर्श से ज़्यादा की आशा करना भी बेईमानी है। क्योंकि, उन्हें तो निर्मल बाबा से लेकर रामदेव तक रिश्ते निभाने हैं । अंतत: एक नेक उद्देश्य के लिए बनी फिल्म बाज़ार में रिकॉर्डतोड़ सफ़लता हासिल करने के बावजूद नतीजे के नाम पर सिफर रही।दरअसल,पीके और समाज के बीच होने वाले जनसंचार के सभी माधय्म रॉन्ग नंबर पर लगे थे।असली पीके और उसके सवालों से संवाद न के बराबर हुआ।भारत की सामाजिक बुनावट और मौजूदा दक्षिणपंथी राजनीति के उफ़ान में सबकी नकली पीके से बात करवाई जा रही हैं।तो क्या पीके जैसी फिल्म का बनना ही ग़लत है ? हरगिज़ नहीं,यह एक मिसाल भर है मौजूदा राजनीतिक,सामाजिक और पूंजीवादी मॉडल की ताक़त का । वह जैसे चाहेंगे चीज़ों को अपने अनुकूल बना लेंगे ।

1 comment:

  1. अब तक फिल्मों में राजनीति दिखाई जाती थी, पहली बार सियासत में फिल्म दिखाने का प्रोग्राम है। गजब की फिल्म है भाई। मानना पड़ेगा आपको

    ReplyDelete