व्यक्ति की जय-जय,व्यक्तित्व की क्षय-क्षय ।
पिछले दिनों दक्षिण अफ्रीका ने अपने प्रकाशमान
ज्योतिपुंज 'नेलसन मंडेला' को खो दिया । अन्याय के खिलाफ़ लामबंद होने वाले मंडेला का जाना स्वभाविक तौर
पर विश्व के लिए क्षति है।इस क्षति पर दुनियाभर के नेताओं ने शौक़ प्रकट किया । हाल में गांधीजी की पुण्यतीथि पर उन्हें याद किया।लेकिन,सवाल ये है कि शौक़ाकुल नेताओं-आम जनमानस ने मंडेला और गांधी जैसे महापुरूषों
से क्या सीख ली ? क्या महात्मा गांधी के गुज़र जाने से लेकर आज
मंडेला तक हमारे दोहरे चरित्र अख्तियार करने के रवैये में कोई ख़ास अंतर आया ? कभी-कभी यह देखकर मन आक्रोशित हो जाता है कि काले रंग को बतौर कालीख किसी
का अपमान करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने वाले भी शौक़ जता कर अपनी नौटंकी
करने से बाज़ नहीं आते । नस्लभेद के खिलाफ़ विरोध का प्रतीक बने नेलसन को श्रद्धांजलि
अर्पित करने में कुछ ग़लत नहीं है पर क्या ऐसा करते वक़्त हम अपनी कारगुज़ारियों पर आत्ममंथन
करते हैं ? जब इन्हीं सब बातों के बारे में सोच रहा था तब ही
एक अजीब घटना से रू-ब-रू हुआ । साकेत मेट्रो स्टेशन पर जैसे ही शेयरिंग ऑटो में बैठा
तो देखा कि किसी अफ्रीकी के आने पर साथ बैठी सवारियां नाक-भौं सिकोड़ने लगी । अपनी
ही जैसी रंगभेदी मानसिकता को समझते हुए ऑटो चालक ने भी उस काले अफ्रीकी को पर्याप्त
जगह न होने का बहाना बनाकर हाथ जोड़ दिए । इतना ही नहीं इससे ज्यादा ख़तरनाक घटना कुछ
महीनों पहले दिल्ली के खानपुर में मौजूद दुग्गल कॉलोनी में हुई । एक बच्चे के गायब
हो जाने के बाद कुछ शुरूआती पूर्वग्रहों के आधार पर समझा गया कि बच्चे को अफ्रीकी उठा
ले गए । इस घटना के बाद अफ़वाह आग की तरह वारदात की जगह के आसपास वाले इलाकों
में फैल गई और कुछ दबंग किस्म के स्थानीय लोगों ने इलाके के तमाम अफ्रीकियों को चुन-चुनकर
घर से निकालकर उन पर हमले करना शुरू किया । जब मामला ख़तरनाक झड़पों में तब्दील होने
लगा तब पुलिस ने नियंत्रण करना शुरू किया । कुछ वक़्त बाद पता चला कि पास ही के इलाके
में रहने वाला एक स्थानीय शराबी बच्चे को नशे में उठाकर ले गया था । फिर हाल में बदलाव की वाहक बनी आम आदमी पार्टी का अपने मंत्री सोमनाथ भारती के मामले में बचाव करना बेहद निंदनीय है । मुमकिन है,जैसा सोमनाथ बता रहे थे वैसा कुछ हो भी रहा हो जिससे स्थानीय लोग कम से कम उनके समर्थन में हैं। लेकिन, यह नाकाबिले यक़ीन लगता है कि आम आदमी पार्टी में शामिल योगेंद्र यादव,अरविंद केजरीवाल समेत अन्य नेताओं को यह समझ नहीं आया कि इस कार्रवाई की मंशा चाहे नेक रही हो लेकिन इससे जो संदेश आवाम में गया वो ग़लत था। एक आदर्शजनप्रतिनिधि होने के नाते सोमनाथ को इस मुआमले में अतिरिक्त सतर्कतता बरतनी चाहिए थी ।
यह तो ऐसी घटनाएं हैं जिन्हें साफ़ तौर पर देखा
और समझा जा सकता है लेकिन मानसिक तौर पर रंग,लिंग,नस्ल,जाति,धर्म के आधार पर बरते
जाने वाले भेदभाव का क्या । किसी सुंदर गोरी लड़की के ज्यादा विवेक सम्मत,बौद्धिक होने पर हैरानी जताना और सांवली लड़की के ऐसे ही विवेक को सामान्य
समझना इसी मानसिक विकृति की एक कड़ी भर है । यहां समझा जाता है कि गोरी लड़की मॉडलिंग
में ही माहिर हो सकती हैं जबकि सांवली-काली लड़की सुंदर नहीं होती । शर्मनाक बात ये
कि रंग,लिंग,नस्ल,जाति,धर्म के आधार पर नफ़रत और भेदभाव का सिलसिला उस
भारत में ही इतना लंबा और विस्तृत है जो महात्मा गांधी को अपना राष्ट्रपिता मानता हैं
और कहा जाता है कि गांधी ही नेलसन की प्रेरणा थे । हम अक्सर तंज कसते हुए महात्मा गांधी
को मजबूरी का नाम बतला देते हैं । जबकि, सच्चाई तो ये है कि वो
मजबूरी नहीं मजबूती का नाम थे । उनकी कथनी और करनी में कभी अंतर नहीं रहा । मुल्क के
ऐसे हालात देखकर निश्चित ही गांधी भी बेहद निराश होते होंगे । जिस गांधी ने धर्म के
नाम पर हो रहें दंगों पर अद्भूत और असधारण तरीके से क़ाबू पाने में कामयाबी हासिल की
और धार्मिक सद्भाव का ऐसा माहौल बनाया कि मुसलमानों के त्योहार पर मस्जिद के बाहर हिंदू
उनका स्वागत करते । उसी के देश में मंदिर-मस्जिद के नाम पर इंसान-इंसान के खून का प्यासा
हो उठा । जिस कांग्रेस को गांधी ने अपने खून-पसीने से सींचा उसी के रहते दिल्ली में
प्रधानमंत्री की हत्या करने वाले उनके अंगरक्षकों की वज़ह से पूरी की पूरी कौम को निशाना
बनाया गया । जिस राज्य में उनका जन्म हुआ था नफ़रतों की आग ने 2002 में उस गुजरात को
भी नहीं बख़्शा और यहां भी धर्म के आधार पर भयानक नरसंहार हुआ । फिर हाल ही में दंगों
की आग से आज़ादी के बाद से महफूज रहने वाले मुजफ्फरनगर के दंगे तो नफ़रतों की एक और
कड़ी है जिसमें कुछ लोगों के निजी विवाद को
शातिराना तरीके से धार्मिक रंग दे दिया । धार्मिक आधार पर विभाजन की त्रासदी ये कि
हिंदू-मुसलमान को और मुसलमान हिंदू को किराये पर मकान नहीं देते
। एक को लंबी दाढ़ी खलती है तो दूसरे को तिलक । मालूम नहीं हम कब नेलसन मंडेला और गांधी
सरीखे महान पुरूषों की तस्वीरों को पूँजने
की जगह उनके सिद्धांतों-आदर्शों को जीने की भी कोशिश करेंगे ।
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