Tuesday, 19 November 2013

संगठन बनाम सरकार ?

पिछले दिनों देश की राजनीति में भूचाल सा आ गया दागी जनप्रतिनिधियों के लिए लाए गए अध्यादेश पर कांग्रेस उपाध्यक्ष एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कुछ ऐसे पेश आए जैसे वह विपक्ष की भूमिका निभा रहे हो | उनके इस तरह अचानक अवतरित होने से  कांग्रेस को क्या नफ़ा हुआ और सरकार को क्या नुकसान इसकी तह में जाने के लिए कुछ सवालों के जवाब ढूंढना ज़रूरी हो जाता है| सवाल ये  हैं कि कांग्रेस उपाध्यक्ष ने जिस भाव-भंगिमा और भाषा शैली के साथ सरकार के अध्यादेश की आलोचना की क्या यह घटनाक्रम सरकार बनाम संगठन के बीच दरारों को ज़ाहिर करता है ? या फिर,मिस्टर क्लिन की छवि खोते मनमोहन और विश्वनीयता के संकट से जूझती उनकी सरकार से संगठन को अलग दिखाने की सोची-समझी कवायद भर है ? दोनों सवालों में यहां सरकार बनाम संगठन के बीच दीवार खड़ी होने की एक लंबी पृष्ठभूमि है जिसके बारे में बात करना मनमोहन सिंह की जी हुजूरी वाली छवि के भ्रम को तोड़ता है| दागी जनप्रतिनिधियों को लेकर लाया गया अध्यादेश कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक के बाद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट के पास पहुंचा था | कांग्रेस कोर ग्रुप की अध्यक्षता खुद सोनिया गांधी करती हैं | फिर सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस उपाध्यक्ष को इस अध्यादेश की जानकारी नहीं थी जिसे उन्होंने बकवास करार दिया |इससे पहले विधेयक पर भी अगर वह चाहते तो जनता के समक्ष अपने विचार ज़ाहिर कर सकते थे| माना जा रहा है कि विधेयक से अध्यादेश लाने के दौरान चुप्पी साधे रखने वाले राहुल और उनकी युवा बिग्रेड तब सक्रिय हो गई जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अध्यादेश पर अपनी सांकेतिक आपत्ति जताई | ऐसे में युवा नेताओं ने राहुल को ज़मीनी धरातल पर इस अध्यादेश के खिलाफ़ बन रहे माहौल से उन्हें परिचित करवाया और उन्हें चेताया कि इस ग़लत फैसले का फायदा भाजपा को मिल सकता है| तब उनके ऑफिस 11 तुगलक रोड पर अध्यादेश का विरोध करने की स्क्रिप्ट लिखी गई |  और साथ ही साथ उन्होंने पीएम को पत्र लिख दिया | पत्र पहले पीएमओ को सौंपा गया फिर फैक्स के माध्यम से वॉशिंगटन गए प्रधानमंत्री को|यहां सवाल उठता है कि क्या राहुल कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाकर अध्यादेश के खिलाफ़ प्रस्ताव नहीं ला सकते थे ?(ज़ाहिर तौर पर जिसके बाद कांग्रेस के प्रवक्ताओं को यह समझा दिया जाता कि इस अध्यादेश वापसी का श्रेय कैसे राहुल को देना है)ऐसा करने से सरकार की लाज भी रह जाती और राहुल की पप्पू छवि जनता के मसीहा के रूप में भी पेश की जा सकती थी|सवाल यहां यह भी है कि  क्या वो प्रधानमंत्री के अमेरिकी यात्रा से आने का इंतज़ार नहीं कर सकते थे ? पहली नज़र में देखें तो उनका  ये कदम डैमेज कंट्रोल की रणनीति नज़र आएगा लेकिन उनकी भाषा शैली और राजनीति में सबसे अहम स्थान रखने वाले वक्त पर गौर किया जाए तो इससें यह भी समझ आ जाता है कि ऐसा करके पार्टी ने मनमोहन सिंह को साफ़ संदेश दे दिया है कि अब आगे की कमान राहुल संभालेंगे | 


दरअसल,प्रधानमंत्री ने जब वॉशिंगटन से लौटते वक्त राहुल के बयान पर प्रतिक्रिया दी तो उनके बयान के कई निहितार्थ निकाले जा सकते हैं | उन्होंने कहा - हम देखेंगे कि हवा का रूख किस तरफ़ हैं और इस बात की तह तक जाने की कोशिश करेंगे की राहुल ने ऐसा क्यों और किस लिए कहा? हवा का रूख किस तरफ़ है से प्रधानमंत्री का क्या मतलब था ? क्या वह यह कहने की कोशिश कर रहे थे कि वह अध्यादेश को लेकर सरकार में  विचार-विमर्श करके ही आगे की रणनीति तय करेंगे बजाय गांधी परिवार के हुकूम पर हामी भरने के?  राहुल ने ऐसा क्यों कहा से क्या वह यह बताना चाह रहे थे कि राहुल ने जिस तरीके से विरोध जताया उसकी जानकारी पहले उन्हें क्यों नहीं दी गई ? जानकारों की माने तो पार्टी के भीतर यह विचार मजबूती से पकड़ बना रहा था कि प्रधानमंत्री की छवि अब धूमिल हो चुकी है।जबकि,राहुल ही पार्टी के लिए एकमात्र ऐसे हथियार हैं जिनके दम पर पार्टी आगे का कारवां तय कर सकती है| शहरी मध्यवर्ग में युवाओं के भीतर भ्रष्ट और आपराधिक नेताओं के खिलाफ़ ख़ासा रोष है जिसकों इस बगावती रणनीति के तहत राहुल ने भुनाने का प्रयास किया |  

अब सवाल उठता है कि क्या मनमोहन सिंह गर्दन झुकाए हर वो काम करने को तैयार हैं जो दस जनपथ चाहें ?  क्या मनमोहन सिंह आज भी वहीं मनमोहन सिंह हैं जो यूपीए -1 का कार्यकाल संभालते वक्त थे और जिस वज़ह से सोनिया ने उन पर भरोसा जताया था |  याद रहें कि इतना सब बवाल होने के बावजूद इस्तीफा नहीं दूंगा कहने वाले ये वहीं मनमोहन हैं जो इस्तीफा देने पर तब अड़ गए थे जब राजीव गांधी ने योजना आयोग के सदस्यों को बंच ऑफ जोकर कह दिया था ( जी सी सोमाया की किताबदी आनेस्ट स्टैंड अलोन में देखें) राजनीतिक पंडितों की माने तो यूपीए-1 से यूपीए-2 के कार्यकाल के दौरान मनमोहन सिंह में ख़ासा परिवर्तन आए |(पत्रकार अभय कुमार दुबे के अनुसार पिछले एक दशक में राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी मनमोहन सिंह ही हैं)सरकार की कामयाबी के लिए गुलदस्तें दस जनपथ और नाकामयाबी के लिए आलोचनाओं का ठिकरा उनके सर फोड़े जाने से वो खीझ खाने लगे|

(कहते हैं तसवीर बिना कुछ बोले बहुत कुछ कह जाती हैं लेकिन कभी-कभी तसवीरें वही कहती हैं जो हम उससें कहलवाना चाहते हैं)
फिलहाल, संगठन बनाम सरकार का खेल समझने के लिए हम दो स्तरों पर आकलन कर सकते हैं एक वैचारिक भिन्नता जो मतभेद से मनभेद की शक्ल में तब्दील हुई|दूसरा सोची समझी रणनीति के तहत एक दूसरे को पटखनी देना | पहले बात करते हैं, वैचारिक मतभेद की जो मनभेद में बदलते गए|आपको याद होगा मनमोहन सिंह का वह विवादास्पद बयान जिसमें उन्होंने देशवाशियों को समझाया था कि पैसा पेड़ पर नहीं उगता|इसी क्रम में इस बार वह कह गए थे कि बेशक मरेंगे लेकिन कुछ करके | मनमोहन और वित्त मंत्री पी.चिदंबरम वकालत कर रहे थे प्रत्यक्ष बहुब्रांड खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश की | माना जाता है कि एक लाख तीस हज़ार करोड़ के खाद्य सुरक्षा बिल को अपना ड्रीम प्रोजेक्ट बताने वाली यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी एफडीआई पर सख़्ती से आगे बढ़ने को लेकर असमंजस में थी वह चाहती थी कि इस बड़े फैसले पर तमाम घटकों को विश्वास में लिया जाए | जहां,तृण्मूल कांग्रेस प्रमुख और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लगातार दस जनपथ के जरिए मनाने की कोशिशें चल रहीं और पार्टी महासचिव जनार्दन द्विवेदी उन्हें अपना एक बहुमूल्य सहयोगी बता रहे थे वहीं प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री करो या मरो जैसी सख्त बयानी कर रहे थे | 14 सितम्बर 2012 को जब ममता ने समर्थन खींच लेने की धमकी दी तो 21 तारीक तक का अल्टीमेटम इस शर्त पर दिया गया कि खुद प्रधानमंत्री इस फैसले पर उन्हें विश्वास में लेंगे| सूत्रों का कहना है कि यह आश्वासन उन्हें खुद कांग्रेस और यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी ने दिया लेकिन प्रधानमंत्री ने ममता को मनाने की कोई कोशिश नहीं की |जिसके चलते यूपीए को अपना एक महत्वपूर्ण सहयोगी गंवाना पड़ा |यहां तक की प्रधानमंत्री का पैसा पेड़ पर नहीं उगता वाला बयान देशवाशियों को कम और सोनिया के जनहितकारी  ड्रीम प्रोजेक्ट खाद्य सुरक्षा बिल पर व्यंग्य ज्यादा था |एफडीआई और खाद्य सुरक्षा बिल से इतर  भूमि अधिग्रहण विधेयक पर भी कांग्रेस और सरकार के बीच कई मतभेद थे जिसमे राहुल गांधी ने अपनी सोच को ग्रामीण विकास मंत्री जयराम-रमेश के जरिए लागू करवाया | 


मनमोहन सरकार की साफ़ सफ़ेद छवि पर काला धब्बा बन चुके कोयला घोटाले और रेलवे बोर्ड नियुक्ति मामले में जब क्रमश पूर्व केंद्रीय मंत्रियों अश्विनी कुमार और पवन कुमार बंसल पर सवाल उठने लगे तब यह बात मुख्यधारा के मीडिया में भी सूर्खियों का विषय बन चुकी थी कि इस्तीफे में देरी के चलते कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पीएम से कड़ी नाराज़गी जताई | दस जनपथ उस समय भ्रष्टाचार विरोधी माहौल की आँधी में इन दो मंत्रियों की वज़ह से अपनी साख पर बट्टा लगवाने के पक्ष में नहीं था | जबकि, पीएम दोनों मंत्रियों के बचाव में थे | इसलिए,तमाम किरकिरी के बावजूद उन्होंने इस विवाद के तीन महीने बाद अगस्त 2013 को अपनी जापान यात्रा के लिए विशेष दूत के रूप में अश्विनी को नियुक्त कर लिया | पिछले साल जहां केंद्र सरकार ने एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी की वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने सरकार का खुलकर विरोध किया|परिणामस्वरूप. रसोई गैस की संख्या बढ़ा दी गई | इससे पहले, अमेरिकी परमाणु करार के दौरान भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विश्व बैंक और अमेरिका का एजेंट तक बतला दिया गया | दरअसल,इस करार की वज़ह से सोनिया सरकार की किरकिरी करवाने के पक्ष में नहीं थी लेकिन मनमोहन आगे बढ़े और संसद में नोटो की गड्डी वाला वह दिन इतिहास के काले पन्नों में दर्ज हो गया |  

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