Tuesday, 9 June 2015

तनु और मनु की शादी में बुद्धिजीवियों की आमद

फिल्मी दुनिया में 'तन्नु वेड्स मनु रिटर्न्स' मोटे तौर पर एक ऐसी ख़ुमारी का नाम है जो दर्शकों के दिलो-दिमाग में लगातार बढ़ती जाती है। ये तीन घंटे से भी कम वक़्त की कहानी बिना शक़ पैसा वसूल कही जा सकती है। 'फैशन के दौर में गारंटी की उम्मीद न करें' जैसी चेतावनियों वाले पोस्टर्स के बीच भरोसे के साथ सिनेमा घर में जा कर देख आने की सलाह दे सकने वाली फिल्म। हालांकि कुछ लोगों को तनु वेड्स मनु रिटर्न्स से बेहिसाब शिकायते हैं। अधिकांश आलोचकों की राय यहां आ कर एकमत हो जाती हैं कि 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स'  कतई नारी सशक्तिकरण की पुरअसर वकालत नहीं करती। बल्कि इस तरह के हमख़्यालों की सोच है कि फिल्म के संवाद से लेकर कहानी का ताना-बाना तक, सब महिलाओं को महज़ वस्तु के रूप में पेश करता है। तहलका पत्रिका में शीबा जी का एक लेख छपा है, जिसका लब्बोलुआप ये है कि तन्नु के किरदार को जिस तरह का खुलापन दिया गया वो अतिवादी किस्म का था। सब उससे बेहाल-परेशान दिखाए गए। जबकि हरियाणा के झज्जर जिले से दिल्ली आई दत्तो अपनी पर्सेनेलिटी के चलते उपेक्षित लगी। साथियों की तमाम दलीलों पर गौर करना इसलिए जरूरी लगा चूंकि बहुतेरे मसलों पर अपनी सोच को इनके साथ खड़ा पाता हूं। सोचा कि कहीं वाकई में मनोरंजन की ख़ुराक में असल और गंभीर मुद्दों को हल्का बनाने वालों की भीड़ में शरीक़ तो नहीं हो चुका हूं ? आख़िर में तमाम वैचारिक समानताओं के बावजूद अपने आप को इस विषय पर अलग छोर पर ही खड़ा हुआ पाया।

सबसे महत्वपूर्ण बात तो यही है कि यह फिल्म किसी भी तरह से किसी विशेष विचारधारा पर आधारित नहीं थी। ना ही इसका नाम महिला सशक्तिकरण के इर्द गिर्द कहानी को पेश करने वाला लगता है। फिल्म पूरी तरह से मनोरंजन प्रधान थी। अभिनय के मुआमले में तनु से लेकर दत्तो, पप्पी भैया, अवस्थी जी, शर्मा जी, हरेक कलाकार की भूमिका क़ाबिले तारीफ़ थी। सवाल है कि फिल्म में मौजूद किरदार हमारी सोच के मुताबिक आदर्शवादी, सिद्धांतवादी कैसे हो सकता हैं ? अवस्थी जी(जिम्मी शेरगिल) एक ठेकेदार के बतौर हमसे मिलते हैं, जिनकी भाषा मर्यादा, गरिमा वग़ैरह की परवाह नहीं करती। वो ये नहीं जानते-समझते कि महिला सशक्तिकरण क्या होता है, पुरूष वर्चस्ववाद क्या बला है और उनका इन बातों से कोई सरोकार भी नहीं। महिलाओं को जूती बराबर मानना तो इनकी फितरत में शुमार है। ठीक हमारे आसपास के किसी आम ठेकेदार या ऐसे ही किसी दूसरे शख़्स की तरह। असल में असली फिल्म तो वही है जो समाज का आईना हो। काल्पनिकता का जितना कम सहारा लिया जाए उतना अच्छा।

तो क्या सभी क्रांतिकारी किस्म की सोच रखने वाले साथी 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' को अलहदा अंदाज़ में पेश करना चाहते हैं ? अपने वक़्त की निहायत क्रांतिकारी और प्रगतिशील मूल्यों से भरीपूरी फिल्म। जिसमें रोज़ा पार्क्स से लेकर कार्ल मार्क्स और महिला नारीवादियों के व्यक्तित्व के किरदार रहें। नाम हो सकता है 'आदर्श वेड्स आदर्शी'। यदि रोज़ाना की रोचक दिमागी कसरत के तहत आलोचना करनी है तो संघी भाई लोगों की तरह विरोध का सरलीकृत रास्ता अपनाया जा सकता था। कह देते कि जिस फिल्म के नाम में ही मनु (मनुस्मृति के संदर्भ में) लगा है, वो क्या खाक़ प्रगतिशील मूल्यों को बढ़ावा देगी ?


तनु वेड्स मनु रिटर्न्स का पोस्टर


नामालूम क्यों ढेर सारे सकारात्मक पहलुओं की मौजूदगी के बावजूद आपको (आलोचकों) महज़ नकारात्मक पक्ष ही नज़र आ रहा है। मसला यह भी है कि आपके सोचने-समझने के नज़रिये पर भी निकाले गए निष्कर्ष की निर्भरता रहती है। नमूने के लिए आपकी आलोचना के चंद मुद्दे। आप कहते हैं कि फिल्म के अंत में लड़की (नायिका) किसी भी दूसरी हिंदी फिल्म की तरह थक हारकर लड़के(नायक) को साज सज्जा से लद कर मनाने पहुंचती है, रोती है, मान जाने की मिन्नतें करती है। मेरा मानना है कि आप पूरा गाना बग़ैर पूर्वग्रह के सुनते तो यक़ीनन इस आरोप से इत्तेफ़ाक नहीं रखते। 'बावली हो गई' वाले इस गीत में कंगना आगे जा कर धमकी भी देती हैं कि कहीं ऐसा ना हो, बाद में तुम भी मेरी तरह रोते रहो और तब मैं वापस नहीं लौटूं। वो नायक के बग़ैर मर जाने की दुहाई नहीं देती। दत्तो को कमज़ोर और उपेक्षित कहने से पहले भी सोचिए। फिल्म को फिर देखिये। फैशनपरस्त तनु पहली बार दत्तो को देखते ही उस पर हंसती है, उसका उपहास उड़ाती है। इस हरकत पर दत्तो का जवाबी संवाद भूल गए ? वो पूरी मजबूती के साथ अपने को बेहतर बताती है। एक ही सांस में सब कह डालना चाहती है कि कैसे वो एक छोटे से गांव के बाहर दिल्ली पढ़ने पहुंची। खेल में कैसे उसने वो मक़ाम हासिल किया जो गांव की दूसरी लड़कियों के लिए ख़्वाब रह जाता है। वो कमा सकती है, अपने बूते जीवन जीने में समर्थ है। तनु ने जो कुछ कहा वो दूषित मानसिकता का परिचायक था जो अपने को बढ़कर और दूसरे को कमतर समझता है।

यक़ीन जानिये, दत्तो अपने आप में मौजूदा समय के हिसाब से बेहद क्रांतिकारी किरदार है। जाट बिरादरी की ये लड़की एथिलीट कोटे से दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला लेती है। मौक़े-बेमौक़े पूरे गर्व के साथ अपने इस हासिल का इज़हार भी करने से नहीं चूकती। दिल्ली की आबो-हवा और इश्क़ का स्पर्श उसे अकल्पनीय सीमा तक बगावती बना डालता है। दत्तो, शर्मा जी यानी अपने इश्क़ को गांव में घर ले जाने का साहस ही नहीं दिखाती बल्कि उनके लिए अपने भाई से झगड़ा तक कर लेती है। वो भाई जो इक्कीसवीं सदी के भारत में भी दकियानूसी विचारों की जकड़न में जकड़ा पड़ा है। जिसके अहम् को यही बात ठेस पहुंचाती है कि उसे उसकी बहन किसी बात पर मुंहतोड़ जवाब दे, तो समझना मुश्किल नहीं कि इस बहन का शहर से दुल्हा लेते आना उसे किस क़दर नागवार गुज़रा होगा ? इसी दौरान जब दोनों भाई-बहनों के बीच जबरदस्त तू तू-मैं मैं शुरू होती है। तब दत्तो का सबसे जानदार संवाद आता है कि 'ग़लती नहीं होने पर डरती तो मैं अपने बाप से भी नहीं हूं, तो तुझसे क्या डरूंगी'। उसके बाद दत्तो का दूसरा भाई जातिवाद पर जबरदस्त कटाक्ष करता है। वो अपने बुजूर्ग से सवाल करता है कि क्या हम लोग डायनासोर की प्रजाति से है, जो दूसरी जाति के छोरे से तेरी छोरी ब्याह गई तो लुप्त हो जाएंगे ? हां, इस बीच वो लगातार 'कंजर' शब्द का प्रयोग करता है जिस पर कई साथियों को परेशानी है, जो यक़ीनन जायज भी है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिये कि सोच में अपने परिवार वालों से अलग मालूम पड़ने वाला शख़्स उसी गांव और मानसिकता का है जिसका वो खुद विरोध कर रहा है। हालांकि, इस शब्द के प्रयोग को लेकर कोसना तो पूरे समाज को चाहिए चूंकि यह बीमार मानसिकता गहरे तक पैठ चुकी है। बड़े पैमाने पर तो लोग इस तरह के शब्दों के प्रयोग की पूरी हक़ीकत से बेख़बर हैं। उन्हें मालूम ही नहीं होता कि हब्शी, चिंकी या फिर कंजर कहने का अर्थ क्या है और यह किसे-किस तरह आहत करेगा। मुमकिन है इस शब्द का प्रयोग किरदार की भाषा के चलते जानबूझकर इस्तेमाल किया गया हो, यह भी मुमकिन है कि लिखने वाले ने खुद लिखते समय इस नज़रिये से नहीं सोचा हो जिस पर बाद में बुद्धिजीवी वर्ग ने तवज्जो दिया।

अंगुली उठाने के लिए फिल्म में यह संवाद ही नहीं, दूसरी भी बहुत बातें हैं लेकिन इसमें भी दो राय नहीं कि सकारात्मक पहलुओं की मुक़ाबले में भरमार हैं। 'बदलचलन' शब्द का तमगा तो बॉलीवुड क्या, जैसे वास्तविकता में भी महिलाओं से ही चस्पां था। इधर तनु-मनु को हम ज़रा से बेवफ़ा क्या हुए, आप तो पूरे ही बदचलन हो गए शर्मा जी कहकर इस पुरानी परिपाटी को तोड़ती है। वो बहुत जगहों पर ज़रूरत से ज्यादा काल्पनिक लगने लगती है, ये अहसास भर देती है कि बेहतर है जो मनु ने दत्तो के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया। इस हद तक तनु को बेफिक्र पेश किया गया कि एक पल को लगने लगता है कि बेहतर ही हुआ जो मनु ने अब इसकी परवाह तक नहीं की। लेकिन गौरतलब है कि फिल्म की शुरूआत से ही बीच-बीच में कई जगह तनु को अपने पति की खातिर फिक्र में डूबा भी पाया गया। पागल खाने से छुड़वाने से लेकर मैसेज का इंतेज़ार करने तक, और दत्तो के एंट्री से तो सब साफ़ हो ही गया। शायद उसे एक ऐसा व्यक्तित्व दिया गया जो खुदकी चाहतों को लेकर उलझी थी। देर-सवेर सुलझने लगती है। अंत में उलझनों को सुलझा लेती है। तनु-मनु को पा लेती है और मनु भी तनु को पा लेता है। अब आप कहेंगे कि दत्तो को तो बेचारी बना ही डाला। जी नहीं, मेरा द्ष्टिकोण यह है कि उसने मजबूरी में खूंटे के साथ बंधी बैल बनना कुबूल नहीं किया। साहस के साथ विवाह से अलग हो गई। वरना शर्मा जी ने कब सात फेरे लेने से रोका था ? अच्छा है कि बेमतलब के रिश्ते में फंसने की जगह उसने उससे बाहर निकलना बेहतर समझा। अब सोचिये वो धीरे धीरे सही इन सबसे निकल कर अधिक परिपक्वता के साथ आगे बढ़ेगी। मुमकिन है फिल्म दत्तो की कहानी को आगे बढ़ाने चाहती है इसलिए उसे यहां इस तरह छोड़ दिया गया। अंत में एक जरूरी बात। यह मेरे विचार हैं जिस तरह आलोचना को लेकर या सराहना करने वालों के रहें।

Tuesday, 6 January 2015

पीके पर विमर्श का रॉन्ग नंबर ।

अलसुबह दफ़्तर से घर की ओर जा रहा था।गली में भगवा वस्त्र पहने बाबा अचानक से टकरा गए।माथे पर बिना रज़ामन्दी के टीका लगा दिया और शनि का प्रकोप दिखाकर रूपये ऐंठने की कोशिश करने लगे।अपने झोले से सांप निकाल पैसे उस पर छुआने को कहा।मैंने मना किया तो ठग बाबा गुंडागर्दी पर उतारू हो गए।अभी तक कृपा का स्त्रोत सांप भय पैदा करने का ज़रिया बन चुका था।उसे मेरे नज़दीक ला कर वह खुलेआम गुंडागर्दी करने लगे।भला हो नज़दीक खड़े एक जानकार का जिनके शोर मचाने से ठग बाबा की हवा निकल गई और झोले में रखे पैसे वो वापस हाथ में थमाकर फौरन रफ्फूचक्कर हो लिए।यह घटना मेरे लिए इसलिए भी चौंकाने वाली थी क्योंकि कुछ समय पहले एकदम ऐसी ही घटना का सामना कर चुका था।यह अनुभव इसलिए साझा किया क्योंकि हाल में अंतरिक्ष से आए पीके पर ख़ूब बवाल मचा है।पीके से मुलाक़ात के दौरान मुझे भी अपने पर यहीं गुज़री याद आ गई थी।दूसरी दुनिया का यह सिनेमाई किरदार पृथ्वी पर आता है और यहीं से कहानी की शुरूआत होती है।कहानी के शुरूआती कुछ भाग से ही समझा जा सकता है कि इसका उद्देश्य धर्म,आस्था के नाम पर चलने वाले ठगी के विशाल साम्राज्य पर हल्ला बोलना है।पीके रोजमर्रा की ज़िंदगी में चल रही कुछ गतिविधियों पर हमारी ख़ामोशी के बीच शोर मचाता है।पीके सवाल पूछता है कि जिस ऊपर वाले को दुनिया का रचियता कहा जाता है उसे अपने ही बच्चों से जुड़ने के लिए धर्म के ठेकेदारों की ज़रूरत क्यों होगी ? (पीके इन्हें मैनेजर कहता है)

उदाहरण के तौर पर शिरडी के साईं हमेशा अपने फक़ीराना अंदाज़ के लिए पहचाने गए । आज उनके मैनेजरों ने इसी फकीर साईं को शाही ठाट-बाट का प्रतीक बना डाला है।कहा जाता है कि साईं अपने जीवनकाल में भीक्षा से ही खानपान का बंदोबस्त करते थे।यह साईं कैसे हो सकते हैं जो करोड़ों की भेंट लेते हैं,सोने के सिंहासन पर विराजमान हैं, बेहिसाब धन-दौलत के जाल में फंसकर मुफलिसी के अँधकार में डूबे अपने बच्चों के साथ भेदभाव करते हैं।मसला सिर्फ़ दान का नहीं बल्कि इसके आधार पर बरते जाने वाले दोहरे मापदंड से है।यह रॉन्ग नंबर नहीं तो क्या है जहां उनके भक्तों की सामाजिक,आर्थिक हैसियत साईं के दर्शन के लिए पहला पैमाना होता है।सम्पर्कों और धन दौलत वालों के लिए ख़ास वीवीआईपी सुविधाएं हैं।साधारण आदमी यहीं लम्बी कतारों के मार्फ़त दोयम दर्जे का व्यवहार पाता है।



पीके जितना हमारी तरह दिखता था सोचता उतना ही जुदा था




ज़ाहिर है कि करोड़ों और अरबों का व्यापार कर रहे ठगों को पीके से एतराज़ होना था।एक स्वामी शंकराचार्य स्वरूपानंद का बयान आया और मुख्यधारा का मीडिया फिल्म पर अपने विवेकानुसार बहस छेड़ने के बजाय उनके एजेंडे पर अमल करते हुए बहस का दरबार सजा बैठा।किसी ने पीके के सवालों का जवाब नहीं मांगा।स्वभाविक तौर पर वह इन सभी सवालों के जवाब दे भी नहीं सकते थे।इसलिए,चर्चा के मुख्य विषय वस्तु मुसलमान(ख़ासकार आमिर के चलते) और इस्लाम तक निपटा दिये गए।कितना बेहतरीन रहता अगर पीके के सवालातों के आधार पर भी चर्चा होती।आस्था,धर्म के नाम पर चल रहे गोरखधंधे,भिन्न-भिन्न धर्मों के बीच ग़लतफ़हमियां उत्पन्न कर नफ़रत पैदा करने वाले सोच पर चर्चा होती,हालिया घटनाओं के ज़रिये बाबागीरी में अपराधीकरण के बोल बाले पर भी बात होती । यह सब सवाल सत्ता,धर्म और पूंजी के गठजोड़ ने बेहद गौण कर दिये । फिल्म को हिंदू धर्म के खिलाफ़ षड्यंत्र बताने वालों में अधिकांश ने शायद यह फिल्म देखी तक नहीं । कुछ टिप्पणी करने की रस्म अदायगी पूरी करने के लिए भी सुनी सुनाई और दूसरों की लिखी जा रही बातों के आधार पर अपने विचार व्यक्त करने लगे । जबकि,असलियत ये है कि फिल्म में भारत जैसे विविधितापूर्ण देश के लिहाज़ से सभी धर्मों को शामिल किया गया है।अपनी एक तयशुदा सीमा के कारण किसी पर कम तो किसी पर ज़्यादा व्यंग्य अथवा कटाक्ष किये गए । ऐसा कहते हुए हमें देश की बहुसंख्यक आबादी और उसी के हिसाब से बाज़ार की ज़रूरत को भी समझना होगा ।

अफ़सोस कि फिल्म पर हुए सार्वजनिक विमर्श का संकुचित दायरा कट्टरपंथियों के लिए ध्रुवीकरण का औज़ार बन गया।बिना किसी ठोस आधार फिल्म को इस्लाम बनाम हिंदुत्व का मंच बनाया गया।हालांकि,मुख्यधारा के मीडिया में चल रहे विमर्श से ऐसे सतही विमर्श से ज़्यादा की आशा करना भी बेईमानी है। क्योंकि, उन्हें तो निर्मल बाबा से लेकर रामदेव तक रिश्ते निभाने हैं । अंतत: एक नेक उद्देश्य के लिए बनी फिल्म बाज़ार में रिकॉर्डतोड़ सफ़लता हासिल करने के बावजूद नतीजे के नाम पर सिफर रही।दरअसल,पीके और समाज के बीच होने वाले जनसंचार के सभी माधय्म रॉन्ग नंबर पर लगे थे।असली पीके और उसके सवालों से संवाद न के बराबर हुआ।भारत की सामाजिक बुनावट और मौजूदा दक्षिणपंथी राजनीति के उफ़ान में सबकी नकली पीके से बात करवाई जा रही हैं।तो क्या पीके जैसी फिल्म का बनना ही ग़लत है ? हरगिज़ नहीं,यह एक मिसाल भर है मौजूदा राजनीतिक,सामाजिक और पूंजीवादी मॉडल की ताक़त का । वह जैसे चाहेंगे चीज़ों को अपने अनुकूल बना लेंगे ।