Friday, 19 December 2014

गोडसे अंत है और महात्मा गांधी अनंत हैं ।

केंद्र में मोदी सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद से एक शख़्स को लगातार ललकारा जा रहा है।यह काम खुद सरकार से जुड़े बदज़ुबान सांसद,संगठनों के नेता कर रहे हैं।यह शख़्स कोई और नहीं बल्कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हैं।जिस महात्मा गांधी को कांग्रेस इस क़दर हाशिये पर धकेल चुकी थी कि उनके दिखाए रास्तों पर चलना तो दूर उनकी चर्चा महज़ रस्म अदायगी बन चुकी थी,आज उसी गांधी की सामाजिक,सांस्कृतिक प्रतिबद्धता को खारिज किया जा रहा है।आखिर,एनडीए सरकार के शुरूआती कार्यकाल में साबरमती का ये संत सबसे मजबूत विपक्ष कैसे बनता जा रहा है ? बापू पर बीजेपी सांसद साक्षी महाराज,आरएसएस का केरल से निकलने वाला मुखपत्र,मुंबई में विहिप की महासभा में साध्वी सरस्वती के हमले तो सिर्फ़ एक बानगी भर है।सुनियोजित ढंग से राष्ट्रपिता की छवि को अपनी सहूलियत के अनुकूल नायक,खलनायक में बदल कर नए तरीके से गढ़ा जा रहा है।असल में नरेंद्र मोदी बेशक देश और विदेश में महात्मा गांधी का गुणगान करें लेकिन उनकी सरकार से जुड़े अधिकांश समर्थकों,मंत्रियों,नेताओं के सोच का बापू के पवित्र विचारों से मुठभेड़ होना बेहद लाज़िमी है।क्योंकि,महात्मा गांधी ने जब से भारतीय राजनीत में प्रवेश किया तब ही से हिंदुत्व की राष्ट्रवादी राजनीति और कांग्रेस के अभिजातीय वर्ग को उनसे कड़ी चुनौती मिली है।बापू ने यूरोपीय राष्ट्रवाद की शहरी और अर्ध शहरी लोकप्रियता को तोड़ते हुए देश के दिल देहातों में दस्तक दी थी।

अपने एजेंडा की रूपरेखा पेश करते हुए उन्होंने पहली दफ़ा ही कांग्रेस अधिवेशन में अपना भाषण देते वक़्त डंके की चोट पर कांग्रेस के राजनैतिक आंदोलन को दिल्ली और मुंबई की शहरी राजनीति बताकर संगठन की किरकिरी कर दी थी। इस गांधी से शुरू-शुरू में कांग्रेस के अभिजातीय तबके तक को चुनौती पेश आई थी पर गांधी के नेतृत्व में आगे बढ़ने के सिवा कांग्रेस के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था।दूसरी तरफ़ अपने दौर के उफ़ान पर पहुंचे हिंदू राष्ट्रवाद के अधिकांश नेता भारत की सांस्कृति और सामाजिक विविधिता से कटे हुए थे इसलिए उनके कुम्बे में हड़कंप स्वभाविक था।बापू ने आस्था और धर्म में विश्वास को बनाए रखते हुए जिस सेकुलर भारत के ताने बाने को बुनना शुरू किया था उसमें वर्चस्व का तत्व मौजूद नहीं था। संघ परिवार के कारकुन अक्सर गांधी की हत्या को 'वध' कहते हैं और विश्व की मानवता के सबसे बड़े ज्योतिपुँज महात्मा गांधी की हत्या पर शौर्य दिवस तक मनाते हैं।गोडसे को राष्ट्रभक्त साबित करने के लिए अपने फॉर्मूला पर अमल करते हुए साज़िशन इतिहास को मनचाहे तरीके से पेश करने में अचूक राष्ट्रवादियों की बिग्रेड उन्हीं पर विभाजन की तोहमत मड़ती है।जबकि,हक़ीकत यह है कि गोडसे ने जो किया वो राष्ट्रप्रेम नहीं हिंदुत्ववाद की राष्ट्रवादी राजनीत थी जिसे गांधी से भय लगता था। 


 नाथूराम गोडसे और महात्मा गांधी

इतिहास गवाह है कि गांधी ने बंटवारे को रोकने के लिए हर मुमकिन प्रयास किया।बापू ने भारत के आखिरी वायसरॉय,नेहरू,जिन्ना तक को साफ़ लफ़्ज़ों में कह दिया था कि मुल्क का बंटवारा मेरी लाश से हो कर गुज़रेगा।यहीं से बापू हाशिये पर धकेल दिये गए क्योंकि साम्राज्यवादी ताक़ते अपने दांव पहले ही चल चुकी थी।फिर भी बापू ने जनवादी कामकाज को जारी रखते हुए दंगों की आग से झुलसते मुल्क को मरहम लगाने का काम किया।दिल्ली में दंगों की आग इतनी भयावह थी कि 'आधी रात को आज़ादी' पुस्तक के मुताबिक नेहरू और पटेल ने लुईस माउंटबेटन के आगे स्थिति काबू करने में असमर्थता जता दी थी।मगर साबरमती के लाल ने तमाम माहौल बिगाड़ने वाले संगठनों(पुस्तक के मुताबिक इसमें आरएसएस भी शामिल रहा) को क़ाबू में करते हुए ऐसा सौहार्द बनाया कि दिल्ली की जामा मस्जिद में क़ौमी एकता का नज़ारा उस वक्त कईयों को चौंकाता था।फिर भी राष्ट्रवाद की अफीम बेच रही ब्रिगेड बापू की छवि को इस क़दर धूमिल करने में कामयाब हो जाए कि बच्चा-बच्चा 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी' बोलें तो इससे बड़ी विडंबना क्या होगी।आज का राष्ट्रवाद भी भीतर से पूरी तरह खोखला है जब ही ये जंल,जंगल,ज़मीन की बात करने से कतराता है,कश्मीर की समस्याओं पर बात करने से हिचकता है,नक्सवाद जैसी समस्या का राष्ट्रवादी द्ष्टिकोण से विश्लेषण कर उसका सरलीकरण करता है।इस देश की सांस्कृतिक,सामाजिक विविधिता की बुनावट का सूत्रीकरण हिंदू राष्ट्र के रूप में करने की नासमझी करता है।इसलिए,ताउम्र विशाल भारत की विविधिता को नज़दीक से समझने वाले बापू से इस राष्ट्रवाद को भय लगता है। बहरहाल,नरेंद्र मोदी और अब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह खुद बदज़ुबानी के इस सिलसिले को थामने का प्रयास करते नज़र आ रहे हैं,क्या वाकई वह ऐसा कर पाएंगे ? उम्मीद तो नगण्य है लेकिन उनकी पहल को देर आयद दुरूस्त आयद के तौर पर देखा जा सकता है।आगे क्या-क्या होता है देखना दिलचस्प रहेगा।

Saturday, 29 March 2014

अलग-अलग चेहरे,अलग-अलग धर्म।। राजनीति का आधार भी अलग ?


आखिर ये इमरान मसूद कौन है जिसने बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर ज़हरीलेबाण छोड़े।मसूद ने मोदी को जान से मारने तक की धमकी दे डाली। सवाल है कि हिंसात्मक भाषा की राजनीति के जरिये अपने वोट बैंक के वृक्ष को बड़ा करने का औज़ार इसे किसने दिया ? क्या,आप समझते हैं कि एक राजनेता भावनाओं का पुतला है और यूं ही भावनाओं में बहकर कुछ भी कह सकता है ? नहीं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।दरअसल,इनके हरेक कदम के पीछे वोट बैंक की खेती का मुकम्मल इंतज़ाम होता है।भारतीय राजनीति मे धार्मिक ध्रुविकरण कोई नई बात नहीं है।ना ही इमरान साम्प्रदायिक राजनीति का एक नया नवेला चेहरा है।इसकी शुरूआत तो इमरान के जन्म लेने से पहले ही हो चुकी थी।हां,इस राजनीति में इमरान एक कड़ी भर है।ज़रा खुदके दिल से सवाल पूछिएगा क्यों इमरान को इस वक्त मोदी पर ही इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना मुफ़ीद लगा ? क्या सिर्फ़ इसलिए कि मोदी आज देश में एक बेहद लोकप्रिय नेता है (?) नहीं,दरअसल ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मोदी उसी कट्टरवादी राजनीति का प्रतीक है जिस राजनीति को औज़ार बनाकर मसूद सरीखे नेता अपनी राजनीति के भविष्य का पुख़्ता आधार बनाना चाहते हैं।बेशक,दोनों अलग-अलग धर्मों की कट्टर राजनीति के झंडाबरदार बनने का अभिनय करते हो। अभिनय इसलिए क्योंकि, बदलती परिस्थितियों के मुताबिक रथ यात्रा निकालने वाले आडवाणी नीतीश कुमार के लिए धर्मनिरपेक्ष बन जाते हैं।कभी एनडीए में शामिल रहें नीतीश सार्वजनिक मंच पर मोदी की शान में कसीदे पढ़ते नहीं थकते तो वहीं नीतीश मोदी को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताने से गुरेज नहीं करते।और चाहते हैं कि इस खतरे से देश को बचाने के सबसे बड़े नायक के तौर पर उन्हें देखा-समझा जाए।

बदलती परिस्थिति के ही मुताबिक गुजरात दंगों के बाद अपने-अपने आशियाने से उजड़े समुदाय की मौजूदा वास्तविक स्थिति पर मोदी समावेशी विकास का भद्दा मज़ाक करने लगते हैं।देवालय से पहले शौचालय की बात करने लगते हैं।लेकिन,चाहें कितना भी मुखौटा ओढ़ लीजिये आपका मूल ज़ाहिर हो ही जाता है।जब ही खुदकी उदार छवि गढ़ने के खेल में जुटे आडवाणी संघ-भाजपा को समावेशी राजनीति की नसीहतें दे डालते हैं।
लेकिन, जैसे ही आडवाणी मोदी के हिंदुत्व पोस्टर के आगे अपने हिंदुत्व पोस्टर को छोटा पड़ते देखते हैं ठीक तब ही खुदकी पुरानी ज़मीन खिसकने के ग़म में बाबरी पर की गई कार्रवाई पर उन्हें गर्व महसूस होने लगता है।वहीं, गुजरात से निकले मोदी किसी विदेशी पत्रकार को इंटरव्यू देते हैं। इंटरव्यू में सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया जाता है।इस भाषा के जरिये मोदी दंगों के दौरान हुए कत्लेआम पर बड़ी चतुराई से सहानुभूति जताते हैं।वो चतुराई से समझ की एक ऐसी लकीर खींच देते हैं जिसके मायने हरेक शख्स अपने अपने हिसाब से निकाल सकता है।आप चाहें इसे उनका अचानक हुआ ह्द्य परिवर्तन समझिये या फिर दंगों में मारे गए बेकसूरों का उपहास।(कार के नीचे वाला बयान)

क्या वाकई इन अलग-अलग चेहरों की राजनीति  का आधार स्तंभ भी भिन्न-भिन्न रहा है ? 
ऐसा नहीं है कि इंटरव्यू में कही गई मोदी की बात को यूं ही चतुराई का खेल समझा गया।इससे पहले गुजरात में कई दफ़ा वो इस तरह के भाषण देते रहे हैं।हां,अब गुजरात से बाहर निकलकर देश की सत्ता पर काबिज होने की राह पर चल निकले हैं तो हमले गुजरात में दिये जाते रहे भाषणों जितने स्पष्ट नहीं होंगे।भाषण हमारे दो उनके पचीस सरीखे नहीं होंगे।एन दंगों के बाद क्रिया के बदले प्रतिक्रिया हुई जैसे संकेत भी नहीं होंगे।हां,अपनी ज़मीन के मूल आधार का ख्याल रखा जाएगा।वहीं,मोदी को चाहने वाला (एक) बड़ा उन्मादी मानसिकता रखने वाला तबका अपने नेता की रैली के दौरान तख्त पर ये नारा लिये दिख जाएगा- लाल किले के चक्कर में राम को भूल न जाना।ये तबका संघ के अखंड भारत की परिकल्पना पर फूले नहीं समाएगा।उसे अपनी आँखों के बंद होने से पहले पाकिस्तान को सार्वजनिक तौर पर ललकारने वाले अपने प्रिय नेता को उसे दो टूक जवाब देते देखना है।बांग्लादेश और पाकिस्तान को जबरन भारत में मिलाना है।मुल्क के मानचित्र पर भगवा रंग रंगना है।मोदी के स्कूल संघ को भी बॉलीवुड में मुस्लिम चेहरों की बादशाहत पर दाऊद का हाथ दिखता है।इसे साज़िश बतलाकर नाकाम करने के लिए उसे आह्वान करना ही करना है कि राकेश के बेटे को आगे करो।(संघ के मुखपत्र में)

मुसलमानों के सबसे बड़े दमदर्द होने का दावा करने वाले मुलायम उत्तर प्रदेश सरकार के छोटे से कार्यकाल में सौ से ज्यादा दंगों पर इस्तीफा नहीं लेंगे।लेकिन,गुजरात दंगों का विलाप करते अक्सर दिख जाएंगे।अपनी-अपनी छाती का दम भरने वाले ये नेता समाज के बीच दरार पैदा करके अंतत:अपनी राजनीति के एक किनारे पर एक ही हो जाते हैं। इन्हीं सब बातों के बीच मसूद जैसे शख्स को भी अपनी रोटियां सेंकनी हैं।इन कट्टरपंथियों की अवसरवाद के सिवा दूसरी कोई कौम नहीं है।एक दूसरे से उर्जा लेकर आमजन से जुड़े मुद्दों के बगैर राजनीति करना इन्हें आसान लगता है।न कोई ख़ास जद्दोजहद,संघर्ष बस नारों,आह्वानों,बेगुनाह कार्यकर्ताओं और आम लोगों की लाशों के बीच गिद्ध अपना पेट भर लेते हैं।

Tuesday, 28 January 2014

व्यक्ति की जय-जय,व्यक्तित्व की क्षय-क्षय ।



पिछले दिनों दक्षिण अफ्रीका ने अपने प्रकाशमान ज्योतिपुंज 'नेलसन मंडेला' को खो दिया । अन्याय के खिलाफ़ लामबंद होने वाले मंडेला का जाना स्वभाविक तौर पर विश्व के लिए क्षति है।इस क्षति पर दुनियाभर के नेताओं ने शौक़ प्रकट किया । हाल में गांधीजी की पुण्यतीथि पर उन्हें याद किया।लेकिन,सवाल ये है कि शौक़ाकुल नेताओं-आम जनमानस ने मंडेला और गांधी जैसे महापुरूषों से क्या सीख ली ? क्या महात्मा गांधी के गुज़र जाने से लेकर आज मंडेला तक हमारे दोहरे चरित्र अख्तियार करने के रवैये में कोई ख़ास अंतर आया ? कभी-कभी यह देखकर मन आक्रोशित हो जाता है कि काले रंग को बतौर कालीख किसी का अपमान करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने वाले भी शौक़ जता कर अपनी नौटंकी करने से बाज़ नहीं आते । नस्लभेद के खिलाफ़ विरोध का प्रतीक बने नेलसन को श्रद्धांजलि अर्पित करने में कुछ ग़लत नहीं है पर क्या ऐसा करते वक़्त हम अपनी कारगुज़ारियों पर आत्ममंथन करते हैं ? जब इन्हीं सब बातों के बारे में सोच रहा था तब ही एक अजीब घटना से रू-ब-रू हुआ । साकेत मेट्रो स्टेशन पर जैसे ही शेयरिंग ऑटो में बैठा तो देखा कि किसी अफ्रीकी के आने पर साथ बैठी सवारियां नाक-भौं सिकोड़ने लगी । अपनी ही जैसी रंगभेदी मानसिकता को समझते हुए ऑटो चालक ने भी उस काले अफ्रीकी को पर्याप्त जगह न होने का बहाना बनाकर हाथ जोड़ दिए । इतना ही नहीं इससे ज्यादा ख़तरनाक घटना कुछ महीनों पहले दिल्ली के खानपुर में मौजूद दुग्गल कॉलोनी में हुई । एक बच्चे के गायब हो जाने के बाद कुछ शुरूआती पूर्वग्रहों के आधार पर समझा गया कि बच्चे को अफ्रीकी उठा ले गए । इस घटना के बाद अफ़वाह आग की तरह वारदात की जगह के आसपास वाले इलाकों में फैल गई और कुछ दबंग किस्म के स्थानीय लोगों ने इलाके के तमाम अफ्रीकियों को चुन-चुनकर घर से निकालकर उन पर हमले करना शुरू किया । जब मामला ख़तरनाक झड़पों में तब्दील होने लगा तब पुलिस ने नियंत्रण करना शुरू किया । कुछ वक़्त बाद पता चला कि पास ही के इलाके में रहने वाला एक स्थानीय शराबी बच्चे को नशे में उठाकर ले गया था ।  फिर हाल में बदलाव की वाहक बनी आम आदमी पार्टी का अपने मंत्री सोमनाथ भारती के मामले में बचाव करना बेहद निंदनीय है । मुमकिन है,जैसा सोमनाथ बता रहे थे वैसा कुछ हो भी रहा हो जिससे स्थानीय लोग कम से कम उनके समर्थन में हैं। लेकिन, यह नाकाबिले यक़ीन लगता है कि आम आदमी पार्टी में शामिल योगेंद्र यादव,अरविंद केजरीवाल समेत अन्य नेताओं को यह समझ नहीं आया कि इस कार्रवाई की मंशा चाहे नेक रही हो लेकिन इससे जो संदेश आवाम में गया वो ग़लत था। एक आदर्शजनप्रतिनिधि होने के नाते सोमनाथ को इस मुआमले में अतिरिक्त सतर्कतता बरतनी चाहिए थी ।


यह तो ऐसी घटनाएं हैं जिन्हें साफ़ तौर पर देखा और समझा जा सकता है लेकिन मानसिक तौर पर रंग,लिंग,नस्ल,जाति,धर्म के आधार पर बरते जाने वाले भेदभाव का क्या । किसी सुंदर गोरी लड़की के ज्यादा विवेक सम्मत,बौद्धिक होने पर हैरानी जताना और सांवली लड़की के ऐसे ही विवेक को सामान्य समझना इसी मानसिक विकृति की एक कड़ी भर है । यहां समझा जाता है कि गोरी लड़की मॉडलिंग में ही माहिर हो सकती हैं जबकि सांवली-काली लड़की सुंदर नहीं होती । शर्मनाक बात ये कि रंग,लिंग,नस्ल,जाति,धर्म के आधार पर नफ़रत और भेदभाव का सिलसिला उस भारत में ही इतना लंबा और विस्तृत है जो महात्मा गांधी को अपना राष्ट्रपिता मानता हैं और कहा जाता है कि गांधी ही नेलसन की प्रेरणा थे । हम अक्सर तंज कसते हुए महात्मा गांधी को मजबूरी का नाम बतला देते हैं । जबकि, सच्चाई तो ये है कि वो मजबूरी नहीं मजबूती का नाम थे । उनकी कथनी और करनी में कभी अंतर नहीं रहा । मुल्क के ऐसे हालात देखकर निश्चित ही गांधी भी बेहद निराश होते होंगे । जिस गांधी ने धर्म के नाम पर हो रहें दंगों पर अद्भूत और असधारण तरीके से क़ाबू पाने में कामयाबी हासिल की और धार्मिक सद्भाव का ऐसा माहौल बनाया कि मुसलमानों के त्योहार पर मस्जिद के बाहर हिंदू उनका स्वागत करते । उसी के देश में मंदिर-मस्जिद के नाम पर इंसान-इंसान के खून का प्यासा हो उठा । जिस कांग्रेस को गांधी ने अपने खून-पसीने से सींचा उसी के रहते दिल्ली में प्रधानमंत्री की हत्या करने वाले उनके अंगरक्षकों की वज़ह से पूरी की पूरी कौम को निशाना बनाया गया । जिस राज्य में उनका जन्म हुआ था नफ़रतों की आग ने 2002 में उस गुजरात को भी नहीं बख़्शा और यहां भी धर्म के आधार पर भयानक नरसंहार हुआ । फिर हाल ही में दंगों की आग से आज़ादी के बाद से महफूज रहने वाले मुजफ्फरनगर के दंगे तो नफ़रतों की एक और कड़ी  है जिसमें कुछ लोगों के निजी विवाद को शातिराना तरीके से धार्मिक रंग दे दिया । धार्मिक आधार पर विभाजन की त्रासदी ये कि हिंदू-मुसलमान को और मुसलमान हिंदू को किराये पर मकान नहीं देते । एक को लंबी दाढ़ी खलती है तो दूसरे को तिलक । मालूम नहीं हम कब नेलसन मंडेला और गांधी सरीखे महान पुरूषों की  तस्वीरों को पूँजने की जगह उनके सिद्धांतों-आदर्शों को जीने की भी कोशिश करेंगे ।