इस तकरार का सिलसिला वैचारिक मतभेद तक ही नहीं बल्कि उससें भी आगे भीतरी क्षेय-मात तक जा पहुंचता है -
इन सब पैंतरेबाज़ियों के बाद पीएमओ में एक ऐसे आईएएस अफसर की नियुक्ती हुई जो गांधी परिवार के बेहद करीबी और अज़िज हैं |उत्तर प्रदेश काडर के आईएएस पुलक चटर्जी को प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रधानसचिव नियुक्त किया गया | पुलक चटर्जी उत्तर प्रदेश के रायबरेली में भी तैनात रह चुके हैं| चटर्जी सोनिया गांधी के स्पेशल ड्यूटी अधिकारी के रूप में भी काम कर चुके हैं | इतना ही नहीं,वे राजीव गांधी फाउंडेशन के लिए भी काम कर चुके हैं | इनसे पहले या कहे सीधा मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के समय से ही (2004)टीके नायर प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रधानसचिव कार्यरत रहे हैं |अब वह बतौर पीएम के सलाहकार कार्यरत हैं | बहराल,माना जाता है कि माना जाता है कि इस वक्त पुलक पीएमओ के जरिए राहुल के लिए रोडमैप बनाने में जुटे हैं |कई हालिया प्रकरण तो इसी बात की तस्दीक करते हैं कि कांग्रेस गांधी परिवार के लाडले को देश का प्रधानमंत्री बनते देखना चाहती हैं लेकिन पार्टी के भीतर कई तरह के सवाल ऐसा करने से उसे रोके हुए हैं|हाल में गुजरात के मुख्यमंत्री और बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता कहीं न कहीं कांग्रेसी खेमे में सीधा खुलकर राहुल को प्रोजेक्ट करवाने में एक खेमे के लिए बाधा बनी हुई है| इस खेमे की राय में राहुल को आगे करके भी पार्टी ने मुंह की खाई तो उनके राजनीतिक भविष्य पर विराम लग जाएगा और कांग्रेसी इस बात को भलि-भांति जानते है कि गांधी परिवार के बिना कांग्रेस का भविष्य क्या है | हालांकि,कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट में जिस तरह से प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के साथ में उनकी तसवीर आती है उससे तो यहीं लगता है कि राहुल को लेकर पार्टी के भीतर माहौल पूरी तरह से बनने के कगार पर है|अब सारा खेल बस इस बात पर आ कर अटक जाता है कि किस तरह से मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुई लानत-मलामत से बचा जाए और बाहर यह संदेश दिया जाए कि राहुल के नेतृत्व में सरकार यूपीए-1 और यूपीए-2 से बेहतर काम करेगी |उसी कवायद के तहत राहुल सरकार की शिक्षा,भूमि,अकाश,अध्यादेश सरीखी नीतियों और फैसलों पर विरोधी स्वर अख्तियार करने नज़र आते हैं | जयपुर चिंतन शिविर को हुए ज्यादा समय नहीं गुज़रा जहां कांग्रेसियों की भाषा का मजमून राहुल को सिंहासन पर बैठाया जाने तक सीमित था | इसी चिंतन शिविर में प्रधानमंत्री के आगमन पर इतना उत्साह नहीं दिखा जितना राहुल के आने पर दिखा |हालांकि,प्रधानमंत्री अक्सर अपने तीसरे कार्यकाल को लेकर पूछे गए सवाल से बचते रहे थे लेकिन पिछले कुछ समय से वो राहुल को आगे बढ़ाने की वकालत करते नज़र आ रहे हैं | जैसे, 7 सितम्बर को सैंट पीटर्सबर्ग में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन से वापस स्वदेश लौटकर उन्होंने कहा था कि राहुल पीएम पद के आदर्श व्यक्तित्व हैं|उनके नेतृत्व में काम करके उन्हें अच्छा लगेगा | दरअसल यह बयान मनमोहन सिंह की ओर से गांधी परिवार के प्रति भक्ति –भाव को महज़ ऊपरी तौर पर दिखाता है लेकिन राजनीति में कालीन से ज्यादा कालीन के नीचे छुपी धूल का महत्व होता है|गौर करने पर मालूम चलेगा कि मनमोहन सिंह ये भक्ति भाव ऐसे समय दिखा रहे थे जब खुद राहुल पार्टी और सरकार में कई मर्तबा पीएम पद की दावेदारी को लेकर बात न करने की नसीहतें दे चुके थे|राहुल के रणनीतिकार उन्हें धीरे-धीरे पर्दे पर लाने के पक्ष में हैं | इसके पीछे उनका मत एकदम से राहुल को प्रोजेक्ट करके आम चुनावों से पहले गुब्बारे में सुई चुबाकर उसे फुस करने से बचाना है | मसलन,वह जानते है कि आज जनता के मिजाज़ की लहर कांग्रेस और सरकार विरोधी ही चल रहीं है और राहुल फिलहाल वो करिश्माई ताक़त नहीं रखते जिससे वो इसका रूख दूसरी तरफ़ मोड़ सकें |इसलिए कांग्रेस,मनमोहन के बाद खाली होने वाली जगह और विपक्ष द्वारा साम्प्रदायिकता से बचाने के लिए एक कारगर हथियार के रूप में उनको धीरे-धीरे पर्दे पर पेश करेगी|जिससें राहुल गांधी की जनता के बीच बनी पप्पू छवि को बदला जा सकें|
