हमारे देश जैसे बुरे हालात किसी दूसरे
के नही हुए | यहां जब-अजब सवाल उठते
रहते हैं | एक अहम सवाल अछूत-समस्या,यह
है कि तीस करोड़ की जनसंख्या वाले देश में जो छ: करोड़ लोग अछूत कहलाते हैं,उनके स्पर्श मात्र से धर्म भ्रष्ट हो जायेगा ! उनके मन्दिरों में प्रवेश
से देवगण नाराज हो उठेंगे !कुएं से उनके द्वारा पानी निकालने से कुआँ अपवित्र हो
जाएगा ! ये सवाल बींसवी सदी में किए जा रहे हैं,जिन्हें
सुनते ही शर्म आती है,हमारा देश बहुत अध्यात्मवादी है,लेकिन हम मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देते हुए भी झिझकते हैं जबकि पूर्णतया
भौतिकवादी कहलाने वाला यूरोप कई सदियों से इन्कलाब की आवाज़ उठा रहा है | उन्होंने अमेरिका और फ्रांस की क्रान्तियों के दौरान ही समानता की घोषणा
कर दी थी | आज रूस ने भी हर प्रकार का भेदभाव मिटाकर
क्रान्ति के लिए कमर कसी हुई है | हम सदा ही आत्मा-परमात्मा के वजूद को
लेकर चिंतित होने तथा िस जोरदार बहस में उलझे हुए हैं कि क्या अछूत को जनेऊ दे
दिया जाएगा ? वे वेद-शास्त्र पढ़ानें
के अधिकारी हैं अथवा नहीं ? हम उलहाना देते हैं कि हमारे साथ
विदेशों में अच्छा सलूक नहीं होता|अंग्रेज़ी शासन हमें
अंग्रेजों के समान नही समझता | लेकिन क्या हमें यह शिकायत
करने का अधिकार है ? सिन्ध के एक मुस्लिम सज्जन श्री नूर
मुहम्मद ने,जो बम्बई कॉऊंसिल के सदस्य हैं,इस विषय पर 1926 में खूब कहा-वे कहते हैं कि जब तुम एक इंसान को पीने के
लिए पानी देने से भी इंकार करते हो,जब तुम उन्हें स्कूल में
भी पढ़ने नहीं देते तो तुम्हे क्या अधिकार है कि अपने लिए अधिक अधिकारों की मांग
करो ?जब तुम एक इंसान को समान अधिकार देने
से भी इंकार करते हो तो तुम अधिक राजनैतिक अधिकार मांगने के भी कैसे अधिकारी बन गए
? बात बिल्कुल खरी है,लेकिन क्योंकि एक
मुसलमान ने कही है इसलिए हिन्दू कहेंगे कि देखो,उन अछूतों को
मुसलमान बनाकर अपने में शामिल करना चाहते हैं.जब तुम उन्हें इस तरह पशुओं से भी
गया-बीता समझोगे तो वह ज़रूर ही दूसरे धर्मो में शामिल हो जायेंगे|
जिनमे उन्हें अधिकार मिलेंगे,जहां उनसे इंसानो-जैसा व्यवहार किया जाएगा | फिर यह
कहना कि देखो जी ईसाई और मुसलमान हिन्दू कौम को नुकसान पहुंचा रहे हैं | व्यर्थ होगा,कितना स्पष्ट कथन है,लेकिन यह सुनकर सभी तिलमिला उठतें है | ठीक इसी तरह
चिंता हिन्दुओं को भी हुई | सनातनी पंडित भी कुछ न कुछ इस
मसले पर सोचने लगे | बीच-बीच में बड़े 'युगान्तकारी' कहे जाने वाले भी शामिल हुए,पटना में हिन्दू महासभा का सम्मेलन लाला लाजपतराय जो कि अछूतों के बहुत
पुराने समर्थक चले आ रहे हैं,की अध्यक्षता में हुआ,तो जोरदार बहस छीड़ी | अच्छी नोकझोंक हुई,समस्या यह थी कि अछूतों को यज्ञापवीत धारण करने का हक़ है अथवा नहीं
? तथा क्या उन्हें वेद-शास्त्रों का अध्ययन करनें का अधिकार है
? बड़े-बड़े समाज सुधारक तमतमा गए,लेकिन
लालाजी ने सबको समहत कर दिया तथा यह दो बातें स्वीकृत कर हिन्दू धर्म की लाज रखी
ली | वरना ज़रा सोचों,कितनी शर्म की
बात होती कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है,हमारी रसोई में
नि:संग फिरता,लेकिन एक इंसान का हमसे स्पर्श हो जाए तो बस
धर्म भ्रष्ट हो जाता | इस समय मालवीय जी- जैसे बड़े समाज
सुधारक,अछूतों के बड़े प्रेमी और न जाने क्या-क्या पहले एक
मेहतर के हाथों गले में हार डलवा लेते हैं लेकिन कपड़ो सहित स्नान किए बिना स्वयं
को अशुद्ध समझतें हैं ! क्या खूब यह चाल है ! सबको प्यार करने वाले भगवान की पूजा
करने के लिए मंदिर बना है लेकिन वहां अछूत जा घुसे तो वह मंदिर अपवित्र हो जाता है
!भगवान रूष्ट हो जाता है | घर की जब यह स्थिति हो तो बाहर हम
बराबरी के नाम पर झगड़ते अच्छे लगते हैं ? तब हमारे इस रवैए
में कृतघ्रता की भी हद पाई जाती है जो निम्नतम काम करके हमारे लिए सुविधाओं को
उपलब्ध कराते हैं उन्हें ही हम दोहराते हैं,पशुओ की हम पूजा
कर सकतें है लेकिन इंसान को हम पास नहीं बिठा सकते |आज इस सवाल पर बहुत शोर हो रहा है उन
विचारों पर आजकल विशेष ध्यान दिया जा रहा है,देश
में मुक्ति-कामना जिस तरह बढ़ रही उसमें साम्प्रदायिक भावना ने और कोई लाभ
पहुंचाया हो अथवा नही लेकिन एक लाभ ज़रूर पहुंचाया है,अधिक
अधिकारों की मांग के लिए अपनी कौम की संख्या बढ़ाने की चिंता सभी को हुई,मुस्लिमों ने ज़रा बराबर अधिकार देने शुरू कर दिए,इससे
हिन्दुओं के अहम को चोट पहुंची,स्पर्धा बढ़ी,फसाद भी हुए,धीरे-धीरे सिख्खो ने भी सोचा कि हम पीछे
न रह जाए,उन्होंने भी अमृत छकाना आरम्भ कर दिया,हिन्दू-सिख्खो के बीच अछूतों के जनेऊ उतारने या केस कटाने के सवालों पर
झगड़े हुए,अब तीनों कौमें अछूतों को अपनी-अपनी और खींच रही
हैं,इसका बहुत शोर शराबा है,उधर ईसाई
चुपचाप उनका रूतबा बढ़ा रहे हैं,चलो ,इस
सारी हलचल से ही देश के दुर्भाग्य की लानत दूर हो रही है |
इधर जब अछूतों ने देखा कि उनकी वजह से
इनमे फसाद हो रहे हैं तथा उन्हें हर कोई अपनी-अपनी खुराक समझ रहा है तो वे अलग ही
क्यों ना संगठित हो जाए ? इस विचार के अम्ल
में अंग्रेजी सरकार का कोई हाथ हो अथवा ना हो लेकिन इतना अवश्य है कि इस प्रचार
में सरकारी मशीनरी का काफ़ी हाथ था 'आदिधर्ममण्डल' जैसे संगठन उस विचार के प्रचार का परिणाम हैं |अब एक सवाल और उठता है कि इस समस्या
का सही निदान क्या हो ? इसका जवाब बड़ा अहम
है,सबसे पहले यह निर्णय कर लेना चाहिए कि सब इंसान समान हैं
तथा ना तो जन्म से कोई भिन्न पैदा हुआ और न कार्य-विभाजन से | अर्थात एक आदमी गरीब मेहतर के यहां पैदा हो गया है इसलिए जीवन भर मैला ही
साफ़ करेगा,और दुनिया में किसी तरह के विकास के काम पाने का
उसे कोई हक़ नहीं है ये बातें फिजूल हैं,इस तरह हमारे पूर्वज
आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया तथा इन्हें नीच कहकर दुत्कार
दिया एवं निम्न कोटि के कार्य करवाने लगे,साथ ही यह भी चिंता
हुई कि कहीं ये विद्रोह ना कर दें,तब पुनर्जन्म के दर्शन का
प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्वजन्म के पापों का फल है,अब
क्या हो सकता है ?चुपचाप दिन गुजारो | इस
तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लंबे समय तक के लिए शांत करा गए,लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया,मानव के भीतर की
मानवीयता को समाप्त कर दिया,आत्मविश्वास एवं स्वालम्बन की
भावनाओं को समाप्त कर दिया,बहुत दमन और अन्याय किया गया,आज उस सबके प्रायश्चित का वक़्त है |
इसके साथ एक दूसरी गड़बड़ी पैदा हो गई
लोगों के मन में आवश्यक कार्यो के प्रति घृणा पैदा हो गई,हमने जुलाहे को भी दुत्कारा,आज कपड़ा बुनने वाले भी
अछूत समझे जाते हैं,यू.पी की तरफ़ कहार को भी अछूत समझा जाता
है,इससे बड़ी गड़बड़ी पैदा हुई ऐसे में विकास की प्रक्रिया
में रूकावट पैदा हो रही है इन सबको अपने समक्ष रखते हुए कि हम ना इन्हें अछूत कहें
और ना ही समझें,बस समस्या हल हो जाती है,नौजवान भारत सभा तथा नौजवान कांग्रेस ने जो ढंग अपनाया है वह काफ़ी अच्छा
है,जिन्हें आज तक अछूत कहा जाता रहा उनसे अपने इन पापों के
लिए छमा-याचना करनी चाहिए तथा उन्हें अपने जैसा इंसान समझना ,बिना अमृत छकाये,बिना कलमा पढ़ाये या शुद्ध किए
उन्हें अपने में शामिल करके उनके हाथ से पानी पीना,यही उचित
ढंग है और आपस में खींचतान करना और व्यवहार में कोई हक़ ना देना,कोई ठीक बात नहीं | जब गांव में मजदूर-प्रचार शुरू
हुआ उस समय किसानों को सरकारी आदमी यह बात समझाकर भड़काते थे कि देखो,इन अछूतों को सिर पर चढ़ा रहे हैं और तुम्हारा काम बंद कराएंगे,बस किसान इतने में ही भड़क गए उन्हें याद रहना चाहिए कि उनकी हालत तब तक
नही सुधर सकती जब तक कि वे इन गरीबों को अपनी जूती के नीचे दबाये रखना चाहतें हैं,अक्सर कहा जाता है कि वह साफ़ नही रहते,इसका उत्तर साफ़
है- वे गरीब है,गरीबी का इलाज करो,ऊंचे-ऊंचे
कुलों के गरीब लोग भी कोई कम गन्दे नही रहते,गन्दे काम करने
का बहाना भी नही चल सकता,क्योंकि मातायें बच्चों का मैला
साफ़ करनें से मेहतर तथा अछूत तो नहीं हो जातीं ? लेकिन यह काम उतने समय तक नहीं हो
सकता जितने समय तक कि अछूत कहे जानी वाली यह कौमें अपने आप को संगठित ना कर लें,हम तो समझते हैं कि उनका स्वयं को अलब संगठनबद्ध करना तथा मुस्लिमों के
बराबार गिनती में होने के कारण उनके बराबार अधिकारों की मांग करना बहुत आशा जनक
संकेत है या तो सम्प्रदायिक भेद का झंझट ही खत्म करो नही तो उनके अलग अधिकार
उन्हें दो,काऊंसिलो और असेम्बिलियों का कर्तव्य है कि वे
स्कूल कॉलेज,कुएं तथा सड़क के उपयोग की पूरी स्वतंत्रता
उन्हें दिलवाएं,जबानी तौर पर ही नही,वरन्
साथ ले जाकर उन्हें कुंओं पर चढ़ायें,उनके बच्चों को स्कूलों
में प्रवेश दिलायें | लेकिन जिस लेजिस्लेटिव के बहाने हाय
तौबा मचायी जाती है,वहां वे अछूतों को अपने साथ शामिल करने
का साहस कैसे कर सकतें हैं ? इसलिए हम जानते हैं कि उनके
अपने जन-प्रतिनिधि हों, वे अपने लिए अधिक अधिकार मांगे,हम तो साफ़ कहते हैं कि उठों,अछूत कहलानें वाले असली
जन-सेवकों तथा भाईयों उठो | अपना इतिहास देखो,गुरू गोविन्द सिंह की फौज की असली शक्ति तुम ही थे !
शिवाजी तुम्हारें भरोसे पर ही सब कुछ कर सके,जिस कारण उनका
नाम आज भी जिन्दा है ! तुम्हारीं कुर्बानियां स्वर्ण अक्षरों
में लिखी हुई हैं |
तुम जो नित्यप्रति सेवा करके जनता के सुखों में बढ़ोतरी करके और
जि़ंदगी संभव बनाकर यह बड़ा भारी अहसान कर रहे हो,उसे हम लोग
नहीं समझते,लैण्ड-एलियेनेशन एक्ट के अनुसार तुम धन एकत्र कर
भी ज़मीन नही खरीद सकते,तुम पर इतना जुल्म हो रहा है कि मिस
मेयो मनुष्यों से भी कहती है-उठो,अपनी शक्ति पहचानों,संगठनबद्ध हो जाओ असल में स्वयं कोशिश किए बिना कुच भी ना मिल सकेगा,स्वतंत्रता के लिए स्वाधीनता चाहने वालों को यत्न करना चाहिए,इंसान की धीरे-धीरे कुछ ऐसी आदतें हो गई हैं कि वह अपने लिए तो अधिक
अधिकार चाहता है लेकिन जो उनके मातहत है उन्हें वह अपनी जूती के नीचे बनाए रखना
चाहता हैं.