Sunday, 29 September 2013

शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का विचारोत्तेजक लेख - अछूत समस्या |

हमारे देश जैसे बुरे हालात किसी दूसरे के नही हुए | यहां जब-अजब सवाल उठते रहते हैं | एक अहम सवाल अछूत-समस्या,यह है कि तीस करोड़ की जनसंख्या वाले देश में जो छ: करोड़ लोग अछूत कहलाते हैं,उनके स्पर्श मात्र से धर्म भ्रष्ट हो जायेगा ! उनके मन्दिरों में प्रवेश से देवगण नाराज हो उठेंगे !कुएं से उनके द्वारा पानी निकालने से कुआँ अपवित्र हो जाएगा ! ये सवाल बींसवी सदी में किए जा रहे हैं,जिन्हें सुनते ही शर्म आती है,हमारा देश बहुत अध्यात्मवादी है,लेकिन हम मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देते हुए भी झिझकते हैं जबकि पूर्णतया भौतिकवादी कहलाने वाला यूरोप कई सदियों से इन्कलाब की आवाज़ उठा रहा है | उन्होंने अमेरिका और फ्रांस की क्रान्तियों के दौरान ही समानता की घोषणा कर दी थी | आज रूस ने भी हर प्रकार का भेदभाव मिटाकर क्रान्ति के लिए कमर कसी हुई है हम सदा ही आत्मा-परमात्मा के वजूद को लेकर चिंतित होने तथा िस जोरदार बहस में उलझे हुए हैं कि क्या अछूत को जनेऊ दे दिया जाएगा ? वे वेद-शास्त्र पढ़ानें के अधिकारी हैं अथवा नहीं ? हम उलहाना देते हैं कि हमारे साथ विदेशों में अच्छा सलूक नहीं होता|अंग्रेज़ी शासन हमें अंग्रेजों के समान नही समझता | लेकिन क्या हमें यह शिकायत करने का अधिकार है ? सिन्ध के एक मुस्लिम सज्जन श्री नूर मुहम्मद ने,जो बम्बई कॉऊंसिल के सदस्य हैं,इस विषय पर 1926 में खूब कहा-वे कहते हैं कि जब तुम एक इंसान को पीने के लिए पानी देने से भी इंकार करते हो,जब तुम उन्हें स्कूल में भी पढ़ने नहीं देते तो तुम्हे क्या अधिकार है कि अपने लिए अधिक अधिकारों की मांग करो ?जब तुम एक इंसान को समान अधिकार देने से भी इंकार करते हो तो तुम अधिक राजनैतिक अधिकार मांगने के भी कैसे अधिकारी बन गए ? बात बिल्कुल खरी है,लेकिन क्योंकि एक मुसलमान ने कही है इसलिए हिन्दू कहेंगे कि देखो,उन अछूतों को मुसलमान बनाकर अपने में शामिल करना चाहते हैं.जब तुम उन्हें इस तरह पशुओं से भी गया-बीता समझोगे तो वह ज़रूर ही दूसरे धर्मो में शामिल हो जायेंगे|


जिनमे उन्हें अधिकार मिलेंगे,जहां उनसे इंसानो-जैसा व्यवहार किया जाएगा | फिर यह कहना कि देखो जी ईसाई और मुसलमान हिन्दू कौम को नुकसान पहुंचा रहे हैं | व्यर्थ होगा,कितना स्पष्ट कथन है,लेकिन यह सुनकर सभी तिलमिला उठतें है | ठीक इसी तरह चिंता हिन्दुओं को भी हुई | सनातनी पंडित भी कुछ न कुछ इस मसले पर सोचने लगे | बीच-बीच में बड़े 'युगान्तकारी' कहे जाने वाले भी शामिल हुए,पटना में हिन्दू महासभा का सम्मेलन लाला लाजपतराय जो कि अछूतों के बहुत पुराने समर्थक चले आ रहे हैं,की अध्यक्षता में हुआ,तो जोरदार बहस छीड़ी | अच्छी नोकझोंक हुई,समस्या यह थी कि अछूतों को यज्ञापवीत धारण करने का हक़ है अथवा नहीं ? तथा क्या उन्हें वेद-शास्त्रों का अध्ययन करनें का अधिकार है ? बड़े-बड़े समाज सुधारक तमतमा गए,लेकिन लालाजी ने सबको समहत कर दिया तथा यह दो बातें स्वीकृत कर हिन्दू धर्म की लाज रखी ली | वरना ज़रा सोचों,कितनी शर्म की बात होती कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है,हमारी रसोई में नि:संग फिरता,लेकिन एक इंसान का हमसे स्पर्श हो जाए तो बस धर्म भ्रष्ट हो जाता | इस समय मालवीय जी- जैसे बड़े समाज सुधारक,अछूतों के बड़े प्रेमी और न जाने क्या-क्या पहले एक मेहतर के हाथों गले में हार डलवा लेते हैं लेकिन कपड़ो सहित स्नान किए बिना स्वयं को अशुद्ध समझतें हैं ! क्या खूब यह चाल है ! सबको प्यार करने वाले भगवान की पूजा करने के लिए मंदिर बना है लेकिन वहां अछूत जा घुसे तो वह मंदिर अपवित्र हो जाता है !भगवान रूष्ट हो जाता है | घर की जब यह स्थिति हो तो बाहर हम बराबरी के नाम पर झगड़ते अच्छे लगते हैं ? तब हमारे इस रवैए में कृतघ्रता की भी हद पाई जाती है जो निम्नतम काम करके हमारे लिए सुविधाओं को उपलब्ध कराते हैं उन्हें ही हम दोहराते हैं,पशुओ की हम पूजा कर सकतें है लेकिन इंसान को हम पास नहीं बिठा सकते |आज इस सवाल पर बहुत शोर हो रहा है उन विचारों पर आजकल विशेष ध्यान दिया जा रहा है,देश में मुक्ति-कामना जिस तरह बढ़ रही उसमें साम्प्रदायिक भावना ने और कोई लाभ पहुंचाया हो अथवा नही लेकिन एक लाभ ज़रूर पहुंचाया है,अधिक अधिकारों की मांग के लिए अपनी कौम की संख्या बढ़ाने की चिंता सभी को हुई,मुस्लिमों ने ज़रा बराबर अधिकार देने शुरू कर दिए,इससे हिन्दुओं के अहम को चोट पहुंची,स्पर्धा बढ़ी,फसाद भी हुए,धीरे-धीरे सिख्खो ने भी सोचा कि हम पीछे न रह जाए,उन्होंने भी अमृत छकाना आरम्भ कर दिया,हिन्दू-सिख्खो के बीच अछूतों के जनेऊ उतारने या केस कटाने के सवालों पर झगड़े हुए,अब तीनों कौमें अछूतों को अपनी-अपनी और खींच रही हैं,इसका बहुत शोर शराबा है,उधर ईसाई चुपचाप उनका रूतबा बढ़ा रहे हैं,चलो ,इस सारी हलचल से ही देश के दुर्भाग्य की लानत दूर हो रही है |

इधर जब अछूतों ने देखा कि उनकी वजह से इनमे फसाद हो रहे हैं तथा उन्हें हर कोई अपनी-अपनी खुराक समझ रहा है तो वे अलग ही क्यों ना संगठित हो जाए ? इस विचार के अम्ल में अंग्रेजी सरकार का कोई हाथ हो अथवा ना हो लेकिन इतना अवश्य है कि इस प्रचार में सरकारी मशीनरी का काफ़ी हाथ था 'आदिधर्ममण्डल' जैसे संगठन उस विचार के प्रचार का परिणाम हैं |अब एक सवाल और उठता है कि इस समस्या का सही निदान क्या हो ? इसका जवाब बड़ा अहम है,सबसे पहले यह निर्णय कर लेना चाहिए कि सब इंसान समान हैं तथा ना तो जन्म से कोई भिन्न पैदा हुआ और न कार्य-विभाजन से | अर्थात एक आदमी गरीब मेहतर के यहां पैदा हो गया है इसलिए जीवन भर मैला ही साफ़ करेगा,और दुनिया में किसी तरह के विकास के काम पाने का उसे कोई हक़ नहीं है ये बातें फिजूल हैं,इस तरह हमारे पूर्वज आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया तथा इन्हें नीच कहकर दुत्कार दिया एवं निम्न कोटि के कार्य करवाने लगे,साथ ही यह भी चिंता हुई कि कहीं ये विद्रोह ना कर दें,तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्वजन्म के पापों का फल है,अब क्या हो सकता है ?चुपचाप दिन गुजारो | इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लंबे समय तक के लिए शांत करा गए,लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया,मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया,आत्मविश्वास एवं स्वालम्बन की भावनाओं को समाप्त कर दिया,बहुत दमन और अन्याय किया गया,आज उस सबके प्रायश्चित का वक़्त है |

इसके साथ एक दूसरी गड़बड़ी पैदा हो गई लोगों के मन में आवश्यक कार्यो के प्रति घृणा पैदा हो गई,हमने जुलाहे को भी दुत्कारा,आज कपड़ा बुनने वाले भी अछूत समझे जाते हैं,यू.पी की तरफ़ कहार को भी अछूत समझा जाता है,इससे बड़ी गड़बड़ी पैदा हुई ऐसे में विकास की प्रक्रिया में रूकावट पैदा हो रही है इन सबको अपने समक्ष रखते हुए कि हम ना इन्हें अछूत कहें और ना ही समझें,बस समस्या हल हो जाती है,नौजवान भारत सभा तथा नौजवान कांग्रेस ने जो ढंग अपनाया है वह काफ़ी अच्छा है,जिन्हें आज तक अछूत कहा जाता रहा उनसे अपने इन पापों के लिए छमा-याचना करनी चाहिए तथा उन्हें अपने जैसा इंसान समझना ,बिना अमृत छकाये,बिना कलमा पढ़ाये या शुद्ध किए उन्हें अपने में शामिल करके उनके हाथ से पानी पीना,यही उचित ढंग है और आपस में खींचतान करना और व्यवहार में कोई हक़ ना देना,कोई ठीक बात नहीं | जब गांव में मजदूर-प्रचार शुरू हुआ उस समय किसानों को सरकारी आदमी यह बात समझाकर भड़काते थे कि देखो,इन अछूतों को सिर पर चढ़ा रहे हैं और तुम्हारा काम बंद कराएंगे,बस किसान इतने में ही भड़क गए उन्हें याद रहना चाहिए कि उनकी हालत तब तक नही सुधर सकती जब तक कि वे इन गरीबों को अपनी जूती के नीचे दबाये रखना चाहतें हैं,अक्सर कहा जाता है कि वह साफ़ नही रहते,इसका उत्तर साफ़ है- वे गरीब है,गरीबी का इलाज करो,ऊंचे-ऊंचे कुलों के गरीब लोग भी कोई कम गन्दे नही रहते,गन्दे काम करने का बहाना भी नही चल सकता,क्योंकि मातायें बच्चों का मैला साफ़ करनें से मेहतर तथा अछूत तो नहीं हो जातींलेकिन यह काम उतने समय तक नहीं हो सकता जितने समय तक कि अछूत कहे जानी वाली यह कौमें अपने आप को संगठित ना कर लें,हम तो समझते हैं कि उनका स्वयं को अलब संगठनबद्ध करना तथा मुस्लिमों के बराबार गिनती में होने के कारण उनके बराबार अधिकारों की मांग करना बहुत आशा जनक संकेत है या तो सम्प्रदायिक भेद का झंझट ही खत्म करो नही तो उनके अलग अधिकार उन्हें दो,काऊंसिलो और असेम्बिलियों का कर्तव्य है कि वे स्कूल कॉलेज,कुएं तथा सड़क के उपयोग की पूरी स्वतंत्रता उन्हें दिलवाएं,जबानी तौर पर ही नही,वरन् साथ ले जाकर उन्हें कुंओं पर चढ़ायें,उनके बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलायें | लेकिन जिस लेजिस्लेटिव के बहाने हाय तौबा मचायी जाती है,वहां वे अछूतों को अपने साथ शामिल करने का साहस कैसे कर सकतें हैं ? इसलिए हम जानते हैं कि उनके अपने जन-प्रतिनिधि हों, वे अपने लिए अधिक अधिकार मांगे,हम तो साफ़ कहते हैं कि उठों,अछूत कहलानें वाले असली जन-सेवकों तथा भाईयों उठो | अपना इतिहास देखो,गुरू गोविन्द सिंह की फौज की असली शक्ति तुम ही थे ! शिवाजी तुम्हारें भरोसे पर ही सब कुछ कर सके,जिस कारण उनका नाम आज भी जिन्दा है ! तुम्हारीं कुर्बानियां स्वर्ण अक्षरों में लिखी हुई हैं |

तुम जो नित्यप्रति सेवा करके जनता के सुखों में बढ़ोतरी करके और जि़ंदगी संभव बनाकर यह बड़ा भारी अहसान कर रहे हो,उसे हम लोग नहीं समझते,लैण्ड-एलियेनेशन एक्ट के अनुसार तुम धन एकत्र कर भी ज़मीन नही खरीद सकते,तुम पर इतना जुल्म हो रहा है कि मिस मेयो मनुष्यों से भी कहती है-उठो,अपनी शक्ति पहचानों,संगठनबद्ध हो जाओ असल में स्वयं कोशिश किए बिना कुच भी ना मिल सकेगा,स्वतंत्रता के लिए स्वाधीनता चाहने वालों को यत्न करना चाहिए,इंसान की धीरे-धीरे कुछ ऐसी आदतें हो गई हैं कि वह अपने लिए तो अधिक अधिकार चाहता है लेकिन जो उनके मातहत है उन्हें वह अपनी जूती के नीचे बनाए रखना चाहता हैं.

Sunday, 8 September 2013

एक भुला दिया गया क्रांतिकारी |

आपने भगत सिंह,सुखदेव,राजगुरू पर फिल्माई फिल्मों में देखा होगा कि एक रोज़ बहुत बड़े मिशन के तहत भगत सिंह बहरी-गूँगी अंग्रेजी हुकूमत तक अपनी आवाज़ पहुंचाने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश संसद में बम फेंकते हैं और कुछ पर्चे बांटने के साथ ही तुरंत अपनी गिरफ्तारी देते हैं|इस मिशन को अंजाम देने में जो शख्स भगत के साथ साए की तरह साथ में मौजूद रहा और जिसने भगत सिंह के साथ ही ब्रिटिश संसद में गिरफ्तारी दी उनका नाम बटुकेश्वर दत्त था जिनकी अठारह नवंबर को एक सौ तीन वीं जयंती हैं| इस ऐतिहासिक और साहसिक मिशन के लिए बट्टुकेश्वर दत्त का चुनाव भगत सिंह ने यूं ही नहीं किया था बल्कि उसके पीछे उनका लंबा जूझारू क्रांतिकारी इतिहास रहा था|इससे पहले बट्टु ने आगरा में बम की फैक्टरी लगाई थी जिसके चलते अंग्रेज़ी हुकूमत ने उन्हें काला पानी की सजा दी|ये वहीं दत्त हैं जिन्होंने भगत सिंह के साथ ब्रिटिश जेलों में भारतीय क्रांतिकारियों,राजनेताओं के साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ़ लाहौर जेल में 144 दिन की भूख हड़ताल करके अंग्रेज़ी तंत्र की नींद उड़ा दी थी|उन्होंने अपनी नौजवानी के लगभग पंद्रह साल देश की आज़ादी के लिए नरक सरीखी जेल की सलाखों के पीछे गुज़ारे|आप सोच रहें होंगे कि अचानक मुझे इस गुमनाम क्रांतिकारी की याद क्यों आईं?दरअल,हाल में जश्न-ए-आज़ादी बनाई गई जिसमें मशगूल हम सब देशभक्त कम ही ऐसे वीरों को याद कर श्राद्धांजलि देते हैं जिनके लंबे संघर्ष और बलिदान की वज़ह से हमें आज़ादी हासिल हुई|फिर,नेता जी सुभाषचंद्र बोस से संबंधित रहस्य से लेकर भगत सिंह को भारत सरकार के आधिकारिक दस्तावेज़ों में शहीद का दर्जा दिलवाने के हमारे तमाम दावें खोखले साबित होते हैं जब हम बट्टु जैसे स्वतंत्रता सेनानी के साथ पेश आए व्यवहार से वाकिफ़ होते हैं|तमाम साथियों को खो देने के बाद बट्टुकेश्वर एक मात्र इतने महान क्रांतिकारी थे जिन्होंने आज़ादी की सुबह देखी|उन्होंने आज़ादी का जश्न देखा,बंटवारे के वक़्त साम्प्रदायिक आधार पर हो रहे कत्लेआम की टीस महसूस की|अपने सपनों के भारत को तो शायद बंटवारे के वक्त ही वो जलते देख रहे थे लेकिन इसी दौरान उन्होंने देखा कि कैसे वतन की खातिर खुशी-खुशी मौत का कफ़न ओढ़ने वालों को वतन वालें भुला देते हैं|आज़ादी की लड़ाई में शरीक बट्टुकेश्वर लगातार मुल्क को गुलामी की अंग्रेज़ी जंजीरों से निकालने के लिए उग्र संघर्ष करते रहे जिसके परिणामस्वरूप उनकी आर्थिक स्थिति काफ़ी दयनीय हो गई|इसी कड़ी में देश की आज़ादी के बाद भी उन्हें गुरबत की ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ी|

जश्न-ए-आजादी के शोर-गुल के बीच मुफलिसी के बादलों से घिरे इस महान क्रांतिकारी को रोजगार की खातिर पटना की सड़कों को बतौर एक सिगरेट कंपनी एजेंट के रूप में छानना पड़ा|आगे जा कर जब यहां मामला जमा नहीं तब बट्टुकेश्वर ने बिस्कुट और डबल रोटी का कारखाना लगाया जिससे हालात सुधरने की जगह और बिगड़ते चले गए.. इस कारखाने को नुकसान के चलते बंद करने के बाद देश के शूरवीर सपूत को टूरिस्ट बनकर गुज़र-बसर करनी पड़ी|कितनी अजीब विडंबना थी कि जिस क्रांतिकारी ने अपनी पूरी ज़िंदगी देश की आजादी के लिए देशभर में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ हल्ला बोला और ब्रिटिश राजतंत्र में अवैध मानी जाने वाली गतिविधियों की वजह से एक पल सुकून की साँस न ली उसे अपने आज़ाद मुल्क में मजबूरन एक टूरिस्ट बनकर ज़िंदगी काटने पर विवश होना पड़ा|जबकि,यह भारतीय सरकार और देश की आवाम का दायित्व बनता था कि वो देश के लिए अपने जीवन की आहुति देने वालें क्रांतिकारियों की देखबाल करें|


खैर,बताया जाता है कि निजी जीवन में एक के बाद एक मिली नाकामयाबी और राजनीति सामाजिक तौर पर उपेक्षा के शिकार दत्त 1964 में पटना के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती हुए|जिसके बाद उनके मित्र चमनलाल ने संवेदनहीन समाज और सरकार के प्रति एक लेख के जरिए अपना क्रोध प्रकट किया था|आक्रोशित चमनलाल तब के केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा और पंजाब के मंत्री भीमलाल सच्चर से भी मिले जिसके बाद पंजाब सरकार ने बिहार सरकार को बट्टुकेश्वर दत्त के इलाज के लिए एक हज़ार रुपय का चेक दिया|साथ ही उस समय बिहार के मुख्यमंत्री केबी सहाय को यह भी आग्रह किया कि अगर वह दत्त का इलाज कर पाने में असक्षम है तो हम उनका इलाज दिल्ली में करवाएंगे|देर से चेती सरकार और प्रशासन के दावों के बीच 22 नवंबर 1964 को उन्हें दिल्ली लाया गया जहां बीमार दत्त को सफदरजंग अस्पताल में एक कमरा मिलने तक में देरी हुई और वहीं ये ह्रद्य विदारक जानकारी मिली की वो कैंसर से पीड़ित हैं|इस दौरान भगत सिंह की मां विद्यावती को पंजाब से कार में लाया गया और ठीक, 17 जुलाई को कोमा में चले जाने के बाद 20 जुलाई 1965 की रात एक बजकर 50 मिनट पर दत्त बाबू इस बेवफा दुनिया से विदा हो गए|अपनी ऐसी हालत से दत्त इतने आहत थे कि उन्होंने इसका मर्मांतक जिक्र करते हुए कहा भी था कि उन्होंने ऐसा सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस दिल्ली में मैंने बम डाला था उसी दिल्ली में एक अपाहिज की तरह स्ट्रैचर पर लाया जाऊंगा|अहसान फरामोश सरकार और समाज ने उनकी इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में भगत सिंह,राजगुरू,सुखदेव की समाधि के निकट किया|


Monday, 29 July 2013

करण तुम हुड़दंगी थे,इसलिए मारे गए !


शासन बदल जाने से मानसिकता नहीं बदलती|ब्रिटिश हुकूमत के दौरान पुलिस किस तरह से सत्ता तंत्र के बाबुओं की जी हुजूरी में लगी रहीं इस बात से शायद ही कोई अपरिचित हो| देश-भर में पुलिस के मूल चरित्र को लेकर यह बात आज भी अनेकों-अनेक उदाहरणों के जरिए सटीक बैठती हैं|जनता की सेवक कम और खुद को शासक अधिक समझती है पुलिस|अभी दिल्ली की सड़कों पर एक पुलिस अफ़सर की रिवॉल्वर से 'करण' नाम के बीस वर्षीय युवा की मौत हो गई और उसके दोस्त पुनीत की हालत नाजुक बनी हुई हैं| क्या,हर वक़्त हमारी सुरक्षा में तत्पर रहने वाली पुलिस के लिए हवा से बातें करने वालें ये बाइक सवार इतनी बड़ी आफ़त बन गए थे कि बौखलाहट में इन शूर वीरों को गोली चलानी पड़ी?हम सब जानते है कि बाइकर्स जत्थों में सालों से इसी तरह गैंग बनाकर तफ़री काटते हैं|हां,पिछले एक महीने भर से इन्हें ज्यादा सक्रिय देखा गया |इस बात में भी शायद ही दो मत हो कि लगातार दिल्ली की वीवीआईपी सड़कों को अपने वाहनों से मौत का मार्ग बना डालने वालें स्टंटबाज़ों के इस कातिलाना जुनून का सड़क यातायात में कई बेगुनाह भी शिकार होते रहते थे|

इन उपर्युक्त पहलुओं के साथ 'दिल्ली पुलिस' और उसका बचाव कर रहें कुछ लोगों की दलील अप्रत्यक्ष रूप से इस निंदनीय घटना का ये ही कहकर संरक्षण कर रहे है कि कुछ न कीजिए तब दिक्कत और कुछ कीजिए तब दिक्कत!आखिर पुलिस करें तो क्या करें?साहेब,अगर कानून व्यवस्था बनाए रखने का मतलब हुड़दंगियों को गोली मारने से हैं तो रहने दीजिए ऐसा ही जस का तस|सवाल आपसे ये होने चाहिए कि लगातार ये लड़के बेखौफ़ कैसे हवा को चीरते हुए खुद की और दूसरों की जान को ख़तरे में डाल अपनी आधुनिक बाइकों को हुड़-हुड़ कर रॉकेट की तरह गतिशील  नज़र आते थे?30 से 35 युवाओं का जत्था किस तरह से अशोका रोड जैसे वीवीआईपी इलाकों में घुस जाता है और पुलिस के बैरीकेंडिग तक इनके आगे बेअसर साबित होते हैं?क्या पुलिस का रिश्वत खौऊ चरित्र कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते लोगों के लिए धार का काम नहीं करता|आप रोज़ाना की सामान्य बोलचाल में भी देख लीजिएगा बिना हेल्मेट तो छोड़िए इतना तो गांव में इलाके के इस्पेक्टर के साथ हुक्का पीते-पिलाते बातचीत बन जाती हैं.. लोग दो पहिया वाहनों की सीट पर सीमा से अधिक संख्या में लदकर बाइक-स्कूटर आराम से चलाते है क्योंकि या तो जेब में ठीक-ठाक रूपय पड़े होते है|

बहरहाल,इस बात को सोचकर भी दिल पसीज जाता है कि कोई हाड़ मांस का इंसान भावनाविहीन हो कर ग़लत रास्ते पर चल रहें युवकों  से निपटने का फॉर्मूला गोली सुझा सकता है या एक मौत को जाय़ज ठहरा सकता है?आप इन युवकों को समाज की सड़ांध मान सकते हैं पर मैं नहीं मानता.. हां,ये जानते हुए कि ये लोग कानून-व्यवस्था को धत्ता बता जाते थे|मेरे मुताबिक 'सख़्ती' और 'तानाशाही' में अंतर होता हैं|जो उस रात पुलिस ने किया वो सख़्ती नहीं वर्दी की तानाशाही का ही एक सुरक्षित रूप था|1857 के पुलिस अधिनियम पर टिकी हमारी पुलिस आज भी जनता की दोस्त नहीं बन सकी हैं|हां,बाबू लोगों का आदेश पालन भलि भांति होगा|मुझे नहीं मालूम पहले इस तरह से कोई अभियान चलाया गया कि नहीं या इस तरह के अभियान को चलाने में क्या-क्या कठिनाई पेश आ सकती थी पर होना य चाहिए था कि पुलिस इन युवाओं की जानकारियां जुटाती और इनके घर तक जाती क्योंकि अमूमन इन बाइकर्स के घर में इत्ती जानकारी रहती है कि दोस्तों के साथ घुमने जाता हैं वगैरह वगैरह पर जान को एक मशीन के भरोसे दाव पर लगाता है ये भी मालूम हो कहा नहीं जा सकता|अलग-अलग जगह पोस्टर्स-बैनर के जरिए युवाओं-बुजुर्गों को जागरूक किया जाता कि कैसे भारत सड़क दुर्घटनाओं के लिहाज़ से सबसे ऊपर रिकॉर्ड बनाए हुए हैं और कैसे आपके सहयोग से यहां हमने खुद को शून्य करना हैं|रफ्तार का शिकार हुए अजरूद्दीन के बेटे अयाजुद्दीन या उसके जैसे अनेक युवा जो एक अच्छी ज़िंदगी जी सकते थे पर रफ्तार ने किस तरह उनकी साँसें छीन ली इस पर विशेष रूप से पुलिस द्वारा स्थानीय स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं|

Sunday, 24 March 2013

एक क्रांतिकारी का दूसरें क्रांतिकारी साथी को पत्र


भगत सिंह ने जब असेंबली में बम्म फेंक कर अंग्रेजी हुकूमत को देश के नौजवानो की ताक़त दिखाने का प्रस्ताव रखा. उसी दौरान असेंबली में 'ट्रेड डिस्पयूट' 'पब्लिक सेफ्टी', बिल भी आने थे जो कि क्रांतिकारियों एवं मजदूर यूनियन की आवाज़ दबाने का एक सख्त कदम था.तब सोशलिस्ट रिपब्लिक्न पार्टी ने उन्हें असेंबली जाने से रोका जिसका कारण शायद संगठन में भगत की भूमिका रहा हो.लेकिन,भगत के नज़दीकी सुखदेव की सोच संगठन और चंद्रशेखर आज़ाद से कुछ विपरीत थी. उनका कहना था कि इस ऐतिहासिक काम को भगत जैसा क्रांतिकारी ही सफलतापूर्वक अंजाम दे सकता हैं.भगत और सुखदेव के बीच हुई नोकझोक के बाद जब भगत ही इस कार्यवाही के लिए चुने गए तब क्या लिखा पत्र में उन्होंने सुखदेव के लिए पढ़े यहां-
प्रिय सुखदेव,
जब तक तुम्हें यह पत्र मिलेगा, मैं जा चुका होऊंगा-दूर एक मंजिल की तरफ. मैं तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आज बहुत खुश हूं. हमेशा से ज्यादा. मैं यात्रा के लिए तैयार हूं, अनेक-अनेक मधुर स्मृतियों के होते और अपने जीवन की सब खुशियों के होते भी, एक बात जो मेरे मन में चुभ रही थी कि मेरे भाई, मेरे अपने भाई ने मुझे गलत समझा और मुझ पर बहुत ही गंभीर आरोप लगाए- कमजोरी का. आज मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं, पहले से कहीं अधिक.
आज मैं महसूस करता हूं कि वह बात कुछ भी नहीं थी. एक गलतफहमी थी. मेरे खुले व्यवहार को मेरा बातूनीपन समझा गया और मेरी आत्मस्वीकृति को मेरी कमजोरी. मैं कमजोर नहीं हूं. अपनों में से किसी से भी कमजोर नहीं भाई! मैं साफ दिल से विदा होऊंगा. क्या तुम भी साफ होगे? यह तुम्हारी बड़ी दयालुता होगी, लेकिन ख्याल रखना कि तुम्हें जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए. गंभीरता और शांति से तुम्हें काम को आगे बढ़ाना है, जल्दबाजी में मौका पा लेने का प्रयत्न न करना. जनता के प्रति तुम्हारा कर्तव्य है, उसे निभाते हुए काम को निरंतर सावधानी से करते रहना.
तुम स्वयं अच्छे निर्णायक होगे. जैसी सुविधा हो, वैसी व्यवस्था करना. आओ भाई, अब हम बहुत खुश हो लें. खुशी के वातावरण में मैं कह सकता हूं कि जिस प्रश्न पर हमारी बहस है, उसमें अपना पक्ष लिए बिना नहीं रह सकता. मैं पूरे जोर से कहता हूं कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर हूं और जीवन की आनंदमयी रंगीनियों ओत-प्रोत हूं, पर आवश्यकता के वक्त सब कुछ कुर्बान कर सकता हूं और यही वास्तविक बलिदान है. ये चीजें कभी मनुष्य के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह मनुष्य हो. निकट भविष्य में ही तुम्हें प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाएगा.
जहां तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं यह कह सकता हूं कि यह अपने में कुछ नहीं है, सिवाए एक आवेश के, लेकिन यह पाशविक वृत्ति नहीं, एक मानवीय अत्यंत मधुर भावना है. प्यार अपने आप में कभी भी पाशविक वृत्ति नहीं है. प्यारतो हमेशा मनुष्य के  चरित्र को ऊपर उठाता है. सच्चा प्यार कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता. वह अपने ही मार्ग से आता है, लेकिन कोई नहीं कह सकता कि कब. एक युवक और एक युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और अपने प्यार के सहारे आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं, अपनी पवित्रता बनाए रख सकते हैं. मैं यहां एक बात साफ कर देना चाहता हूं कि जब मैंने कहा था कि प्यार इंसानी कमजोरी है तो यह एक साधारण आदमी के लिए नहीं कहा था. आम आदमी जिस स्तर पर होते हैं, वह एक अत्यंत आर्दश स्थिति है. जब मनुष्य प्यार व घृणा इत्यादि के आवेगों पर काबू पा लेगा, जब मनुष्य अपना आधार आत्मा के निर्देश को बना लेगा, वह स्थिति मनुष्य के लिए अच्छा और लाभदायक होगा.
क्या मैं यह आशा कर सकता हूं कि किसी खास व्यक्ति से द्वेष रखे बिना तुम उनके साथ हमदर्दी करोगे, जिन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत है? लेकिन तुम तब तक इन बातों को नहीं समझ सकते जब तक तुम स्वयं उस चीज का शिकार न बनो. मैं यह सब क्यों लिख रहा हूं? मैं बिल्कुल स्पष्ट होना चाहता था. मैंने अपना दिल साफ कर दिया है.
तुम्हारी हर सफलता और प्रसन्न जीवन की कामना सहित,
तुम्हारा भाई

Tuesday, 29 January 2013

आईसोम्स में गणतंत्र दिवस समारोह |



26 जनवरी 1950 हम सब ही देशवासियों के लिए ख़ासा महत्व रखता हैं.इसी दिन भारत का संविधान लागू हुआ था और तमाम समाजशास्त्र से जुड़े विद्वानों की वह चुनौती मुंह बाये खड़ी थी कि भारत की विविधता उसका आकार-प्रकार ऐसा हैं कि इसके एक राष्ट्र बनें रहने की संभावना काफ़ी कम हैं.यदि,यह एक राष्ट्र रहता भी हैं तो अलगाववादी तत्व और कुछ निरंकुश शक्तियां इस के गणतंत्र को समाप्त कर देगी.सभी बुद्धजीवि स्वतंत्र भारत के गण और तंत्र को लेकर इतनी शंका में थे कि इसे एक अस्वभाविक राष्ट्र का दर्जा दिया जाने लगा.इन्हीं चुनौतियों को मुंह तोड़ जवाब देते हुये हम दिनांक 'पच्चीस जनवरी' को गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर अपने काँलेज आईसोम्स में ही इस खुशी के मौके पर तैयार थे भारत के 64 वे गणतंत्र पर अपनी-अपनी बात रखनें और इस पर गर्व महसूस करने को.इस कार्यक्रम को आरम्भ करते हुये मंच की कमान संभाली बीएमसी के छात्र 'प्रकाश' ने.वही छात्रों को सुनने एवं अपने विचार प्रकट करने के लिए वहां मौजूद थे काँलेज के ही आदरणीय शिक्षक गण.सबसे पहले अपनी बात और गणतंत्र दिवस की मुबारक़बाद देने मंच पर प्रथम वर्ष बीएमसी की छात्रा 'अकांक्षा' आयी जिन्होंने सब अच्छा होने की कामना करते हुये महिलाओं को उनके हक़ मिलें इस बात पर जोर दिया.ऐसे ही प्रथम वर्ष के छात्र 'हर्ष' ने अलग ही नजरियां पेश करते हुये भ्रष्टाचार की सफ़ाई के साथ-साथ देश को साफ़ रखने की बात कही.उन्होंने व्यंग्य शैली में कहा-"हम यहां भाषण दें कर नीचे उतरते ही सब भूल जाते हैं".इसी बात को आगे बढ़ाते हुये द्वतिय वर्ष बीएमसी से 'उर्वषी' और काँलेज के बहुत से छात्रों ने स्वयं की आत्मशुद्धी की मांग पर बल दिया.

जब विचारों के आदान-प्रदान के बीच माहौल बेहद गम्भीर होने लगा था तो एमएमसी के छात्र 'सुशांत' ने अपनी आवाज़ के जरिए सरहद पर खड़े उन जवानों की याद दिलाते हुये सब को एक सुर में वह गीत गाने के लिए तैयार कर दिया जिसके शब्द हैं-'बस इतना याद रहें,एक साथी और भी था'.भावात्मक माहौल के बावजूद गौर करने वाली मुख्य बात यह रही कि देश के प्रति श्रद्धा-भाव रखने के साथ साथ समारोह में रहें कुछ छात्रों जैसे एमएमसी के 'विकल्प त्यागी' ने मौजूदा विकास के पैमाने पर सवालियां लहजे में प्रश्न चिन्ह लगाते हुये कहा-हमें तय करना होगा के हम विकास की ओर तेज़ी से अग्रसर हैं लेकिन यह विकास भी हमें अनिवार्य रूप से चाहिए तो किन शर्तों पर ? क्या यह विकास किसी गांव,जंगल को उजाड़ कर किया जाएं तो हमें यह स्वीकार होगा ?कुछ इसी तल्ख लहजे में 'रौनक' ने भारतीय समाज के जाति-धर्म के आधार पर आपस में विभाजित होने को लेकर चिंता जताई.'अंकित मुत्त्रीजा' ने देश के आखिरी नागरिक की आवाज़ सुनी जाएं इस बात पर जोर दिया और कहा कि गण का वर्तमान राजनीति में ख़ासकर युवाओं का हस्तक्षेप करते रहना बहुत ज़रूरी हो गया हैं यदि ऐसा नही होता तो दुर्भाग्यवश हमारा तंत्र उसे नज़रअंदाज कर देता हैं.इन्हीं बातों में शायद देश के सामने मौजूद चुनौतियां भी झलक रही थी जिसका जवाब तलाशना अहम हैं.कार्यक्रम के दौरान ही खाने की व्यवस्था हुई तब भी छात्रों ने पहले इन गम्भीर मसलों पर बात करना अपनी प्राथमिकता में शामिल करते हुये वार्तालाप का सिलसिला जारी रखा.'अंकुर' ने निजी स्वार्थ को किनारे कर देश की उन्नति में सहयोग देने की बात कही तो वही 'नमन' ने दो टूक कहा-बात करने से बेहतर हैं,मैं देश के लिए कुछ अच्छा करें.. क्यों न अभी से,यही से ?


देश के प्रति सम्मान-भाव और उसके भविष्य से जुड़ी आकांक्षाओं,उम्मीदों के बीच देश की राजधानी दिल्ली में हुई 16 दिसंबर की वह जघन्य घटना का जिक्र बार-बार छिड़ा जिसने देश को झकझोर दिया.सवाल यह भी उठा कि राजधानी दिल्ली में हर वर्ष होता शक्ति प्रदर्शन और हमारे सैनिकों का मान क्यों यहां से निकलकर पूर्वोत्तर के राज्यों में भी नही जाता.एक छात्र ने इन्हीं बातों के बीच हंसी के ठहाके यह कह कर लगवा दिए की ये देश वीर जवानों का हैं,हमें मालूम भी हैं लेकिन सिर्फ गणतंत्र दिवस से दो दिन पूर्व ही क्यों यह गाने बजते हैं,बजते भी हैं तो इतनी तेज़ ध्वनि में क्यों कि दूसरों को परेशानी हो.?तब बच्चों की हंसी रूकी ही थी कि हमारे शिक्षक श्री 'विवेक त्रिपाठी' मंच पर आएं और देश के युवाओं से अपेक्षाएं हैं कहते कहते भारत का गणंतंत्र और उसकी खुबियों पर बतातें-बतातें उन्होंने वर्तमान स्थिति को चिंता जनक बताया और कहा कि अधिकारों की लड़ाई अब शायद आंतरिक जनविरोधी ताक़तो से हैं.तुंरत बाद बच्चों ने उनसे उनकी प्रसिद्ध कविता सुनाने का आग्रह भी कर डाला जिसके लिए वह मना भी न कर सकें.कविता का आनंद उठाठे हुये छात्र वाह-वाह और तालियां भी बजाने लगें.जिसके बाद श्री.'अरिंदम' ने अच्छा नागरिक बनने से पहले एक अच्छा इंसान बनने की बात कही.अंत में काँलेज के डायरेक्टर श्री. 'अंबरीश सक्सेना' ने अपनी बात रखी और कहा-मुझे अच्छा लगा सब बच्चो ने मिलकर यह कार्यक्रम आयोजित किया और लोकतंत्र/गणतंत्र में सबसे ज्यादा ज़रूरी हैं कि हर इंसान अपनी बात रखें जैसा यहां भी हुआ.

उन्होंने कहा लोकतंत्र सोए नही ज़िंदा लोगों का तंत्र हैं.जनआंदोलन से ही परिवर्तन आता हैं और पिछले डेढ़ दो साल से जो कुछ भी हुआ वो एक स्वस्थ लोकतंत्र की तरफ आशन्वित करता हैं.अब यह मंच और कक्षा आप ही लोगों की यह गीत,कविता,चर्चा,जो करना चाहें करे लेकिन ध्यान रहें युवाओं को ही देश की दशा और दिशा तय करनी हैं.इन्हीं बातों के साथ समारोह समाप्त हुआ और ब्रहमदेव भाई के हाथों से दिए जा रहें समोसे,लड्डू,चाय के साथ छात्रों ने कार्यक्रम को  यहां पर विराम दिया.|

Thursday, 2 August 2012

भूलना नही वो चीख रही थी,हैवान हस रहे थे और आप देख रहे थे..


हम लोगो की यादाश्त इतनी कमज़ोर होती हैं कि चाहें वो किसी मंत्री द्वारा किया गया कोई घोटाला हो,किसी पार्टी द्वारा चुनावों में किये गए वायदें..या फिर किसी महिला के साथ हुई बदसलूकी.हम सब भूल जाते हैं..भले घटना के वक्त फेसबुक पर चर्चा करना हो ,अपना आक्रोश दिखाना हो या बदस्लूकी की मार्फत इतना मानसिक तौर पर प्रभावित होना के हम अपने आस-पास में रह रहे हर एक मर्द से घृणा करने लगते हैं ..
(ऐसा हाल में गुवाहाटी मामलें के बाद भी देखा गया जब स्त्रीयों का गुस्सा संचार के विभन्न माघ्यमों से बाहर आने लगा)आज इतना आधुनिक हो जाने के बावाजूद भी हमने अपनी पुरूष प्रधान सोच,विचार को इतना अड़ियल बना लिया के सूचना क्रांति के इस युग में उसे(स्त्री) फोन रखकर मार्केट जाने की मनाही हो जाती हैं,किसी स्त्री के साथ कोई मर्द दुष्कर्म करे तो देखा जाता हैं.. 'ये दुष्कर्म कितने बजे हुआ' ? रात में हुआ,तो सीधा सीधा उस महिला को दोषी बना दिया जाता हैं जो पहले से पीड़ित हैं.शहर में रह रही युविका यदि देर रात घर आती हैं तो मोहल्ले में उसे लेकर चालचलन की बातें गढ़ना आम हैं.. कोई मतलब नही कि कैसी परिस्थितियों के मद्दे नज़र वे युविका ऐसा कर रही हैं,या आपके खुद के घर में आपका हुनहार पुत्र कई दिनो तक नदारद रहता हो,क्योंकि उसे तो कंपनी की तरफ से किसी काम के सिलसिले में बाहर जाना पड़ गया,वो घर चलाता हैं..उसका और आपका पेट हैं जो रोटी मांगता हैं,शरीर हैं जो खुली हवा चाहता हैं..एक स्त्री को भला इन सब चीज़ो की क्या जरूरत..एक स्त्री की सारी परेशानी शायद वही से शुरू हो जाती हैं जब वो पैदा होती हैं इस गोल संसार में योनि लिए. यही अंग तय कर देता हैं उसकी आगे की पूरी जिंदगी को.. हम अपने घर के भीतर झांकते हैं तो मां,बहन,बीवी, आदि के रूप में हमे इसी स्त्री की सुरक्षा,आजादी अहम लगने लगती हैं..पर जब यही स्त्री सड़क पर चल रही हो या बस में धक्के खा रही हो,तो हमे बदचलन लगती हैं.. हम सवाल उठाते हैं कि ऐसे माहौल में जहाँ इंसान-इंसान को खा जाता हैं ये छोटी स्कर्ट पहने बाहर क्यो घूम रही हैं.?ये ऐसा मानसिक प्रहार होता हैं हमारे समाज पर जो धीरे धीरे किसी ना किसी रूप में एक दिन स्वतंत्रता पर लगाम कसने में सार्थक साबित होता हैं .. दरअसल ऐसे मामले जिसमें एक स्त्री को प्रताड़ित किया जाता हैं,उसका बल्तकार किया जाता हैं... इनकी सूची इतनी लंबी हैं के आपको जानवरो के प्रति संजिदगी उत्पन करने वाले तमाम खबरिया चैनल हल्के लगने लगेंगे .. अमेरिका में एक सर्वे हुआ तो पाया गया के पीछले दस सालों में भारतीय अखबारों के अनुसार तकरीबन 150 लड़कियों पर तेज़ाब फेका गया..|


स्त्री और पुरूष दो ऐसे सत्य हैं जिनके बिना संसार की कल्पना करना तक असभंव हैं,दोनो एक दूसरे के बिना अधूरे हैं.. फिर जब यहाँ ऐसी स्थिति हो कि दस से बीस हैवान मिलकर एक सौलह साल की बच्ची को पीटे उसके कपड़े फाड़े,सारी भीड़ एक जमावड़ा बनके मूख दर्शक बनी रहे , हम किस चीज की उम्मीद रखना जाय्ज समझ सकते हैं ऐसे समाज से .. जब स्त्री  पूरूषो के कारण ही आसुरक्षा का भाव महसूस करने लगे तो क्या यह कहना गलत नही होगा के खूखार जानवरों को नही ऐसे पुरूष प्रधान समाज को कहना जाय्ज हैं जो आगे कुछ और पीछे कुछ होता हैं.. जहाँ स्त्री पूजी देवी समान जाए और वास्तीविकता में उसे सिर्फ प्रताड़ित किया जाए.. हमारे ग्रंथो में पुराणों में भी वो सहती और सिर्फ सहती आयी हैं.. जब गुवाहाटी में एक बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ तब मैंने देखा के कई स्त्री विमर्शकारी महिलाए हैं जो धड़ले से अपना खेमा बना रही हैं मर्दो के विरोध में.. जिन मर्दो को स्त्रीयों की सुरक्षा के लिए तत्पर रहना चाहिए वो इसमें असफल रहे जब ही लगभग आधे घंटे तक कुछ हैवान मिलकर इस कुकृत्य को साहस से करते रहैं .. |

 शुरूवात में मुझे लगा के इन लोगों को जिन्होंने इसे घिनौनी हरकत को होते हुये देखा उन्हें मानवता के अधिन ही क्यो माना जाए.. ? पर नही बाद में मेरी सोच में परिवर्तन आया.. मुझे महसूस हुआ कि अगर वो लोग जिन्होंने इस कुकर्म को खुली आंखो से देख कर भी प्रतिरोध की भावना को स्वर नही दिया,आगे नही बढ़ सके,ऐसे पिशचों को सबक नही सिखा सके ...जिन पर सारा जमाना थू थू कर रहा हैं,तो उन मूख दर्शक पर कौन सा गर्व करना चाहिए..?दरअसल बहुलता देखे तो मालूम चले के पहली महिला आईपीएस अफ्सर,पहली महिला राष्ट्रपति आदि आकड़ो के बावाजूद भी हम आज भी कई यूग कई सदी पीछे चल रहे हैं .. गुवाहाटी में बच्ची के साथ जो हुआ उससे वो जितना प्रताड़ित हुई उससे अधिक जांच के लिए घटित भेजी 'महिला आयोग' की टीम से हुई होगी.. एयरपोर्ट पर पहुंची टीम इस सलीखे से तस्वीरों के साथ अखबारों पर आई जैसे वो इतने संवेदनशील मसले पर कारवाई करने हेतु नही अपितु पिकनिक के लिए गुवाहाटी गई हैं.. इतना ही नही राष्ट्र शर्म की बात तब हुई जब टीम में शामिल सदस्य 'अलका लाम्बा' ने पीड़ित बच्ची की पहचान मीडिया के आगे सार्वजनिक कर दी.उसके बाद उन्हें टीम से निकाल दिया गया..पर क्या वो खूद उन अपराधियों जितनी दोषी नही हैं,जिन्होंने बच्ची के साथ ऐसा हैवानी व्यवहार किया.? जब कोई महिला बल्तकार जैसी साजिश का शिकार बनती हैं तो उससे अधिक पीड़ा उसे तब होती हैं जब उसकी पहचान जाहिर की जाती हैं,इसलिए पीड़ीत की पहचान सार्वजनिक करना गैर कानूनी हैं..

इतना ही नही जब बल्तकार की शिकायत होती हैं तो किस प्रकार बिना अनुमती के कोई जांच यंत्र उसकी योनि में घुसेड़ दिया जाता हैं और नर्स या बाकी अधिकारी.. जब उसे बल्तकार पीड़ित कह,कह कर,उसकी आत्मा तक रौंद देते हैं.. सही मायनों में तब उसका समाजिक कत्ल होता.. ऐसा आप कुछ माह पहले की एक तहलका रिपोर्ट में भी पढ़ सकते हैं..सोच का विषय यह भी हैं कि कैसे "पुलिस और आम लोगो" के बीच भरोसे का पुल बनाया जाए.. वो भी तब जब लखनाऊ के एक थाने में ही पुलिस द्वारा कैदी महिला के साथ जोर जबरदस्ती का मामला सामने आएं.. गुवाहाटी में कुछ दरिंदे मिलकर सरे आम छाती चौड़ी कर देश की इज्जत को रौंद रहे हो,आधे गंटे तक रौंदते रहे.. उसके बाद भी सभी आरोपी कई दिनों तक हत्थे ना चड़े,पुलिस अधिकारी खुद महिलाओ के पहनावें को दोषी मानते हो,उत्तेजनक करार करते हो..| उस मीडिया का भी क्या कहें.. जिसके संपादक रात को बार(पब)जाने वाली अधिकांश लड़कियो को वैशया कह कर पुकारे(गुवाहाटी मामले के बाद ही वही के एक स्थानीय चैनल के एडीटर द्वारा कहीं गई बात)दरअसल इस बार हमें हमेशा की तरह ऐसी दुखद घटना से आगे तो बढ़ना ही हैं ,बढ़ना होगा भी पर इन सभी चीज़ो को भूले बिना| याद रखना होगा एक,एक बात को और जरूरी हैं कि सार्वजनिक जीवन में भी हम सतर्क रहे सिर्फ अपनी बहन,बेटी,प्रेमिका के लिए नही बल्कि इस पूरे समाज के लिए और किसी विकृत मानसिकता को फलने फूलने ना दे कर,उसका विरोध करे चाहें वो हवस भरी नज़रो से मेट्रो में किसी महिला को किसी पुरूष द्वारा घुरना हो या बस की भीड़ का लाभ उठाये चिपकना ..अभी भी वक्त हैं एक बहतर समाज को विकसित होने देने का .. |

Thursday, 26 July 2012

राहुल गांधी की आर या पार की राजनीतिक जंग..



गांधी परिवार के युवराज को लेकर काफ़ी समय से चली आ रही सक्रिय राजनीति की मांग अब धीरे धीरे साफ होती जा रही हैं..  2004 से अमेठी लोकसभा से सांसद बने राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत अपने पिता स्वर्गीय राजीव गांधी के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र(अमेठी)से की. फिर यही सिलसिला उन्होंने 2009 के लोकसभा चुनाव में बरकरार रखा और इस बार निकटम प्रतिद्वंद्वी को 3,33,000 वोटों के अंतर से पराजित कर उत्तर प्रदेश के अमेठी को अपना निर्वाचन क्षेत्र बनाएं रखा.. इसी उत्तर प्रदेश को आगे चल कर उनके राजनीजिक भविष्य से जोड़ कर देखा जाने लगा.. जहां लंबे समय से कांग्रेस मूहं की खाती आई.. वही की जिम्मेदारी उनके कंधो पर सौपी गयी.. उन्हें उत्तर प्रदेश 2012 विधानसभा चुनाव एक स्टार  प्रचारक और मुख्य रणनीतिक नेता के रूप में दिया गया.

 राहुल ने बेहिसाब रैलियां,सभाएं की.. उसके बावजूद अपनी जमीनी स्तर की सक्रिय राजनीति के लिए पहचाने जाने वाले राहुल,उत्तर प्रदेश 2012 विधानसभा चुनाव में विफल रहे.. पार्टी छ: सीटे अधिक तो लें पाई पर उपेक्षाओं पर खड़ी नही उतर पाई. यदि पार्टी यहां अच्छा करती जैसे की कयास लगाए जा रहे थे, और नंबर 3 पर भी आती तो संभव था की तब ही से राहुल का रास्ता एक बेहद ही बड़े और महत्वपूर्ण पद के लिए खोला जाता.. पार्टी के अधिकांश नेताओं ने इस हार का दाग राहुल पर नही लगाना ठीक समझा.. चाहें हार के कारणों पर विचार विमर्श करने वाली एंटनी कमेटी हो,सब ने 
उन्हें क्लीनचिट दीं पर स्वंय राहुल ने इस हार को खूद की विफलता से जोड़ कर मीडिया के समक्ष कबूल किया.स्थिति साफ थी अपने राजनीतिक करियर की शुरू्आत के साथ जातिगत राजनीति का सफ़ाया हो,कहने वाले राहुल खूद जातिगत राजनीति का कार्ड चल कर भी खाली निराशा लिए यूपी से वापस लौटे.
(यूपी के रमानगर में  सैम पित्रोदा का असली नाम सत्यनारण गंगाराम पित्रोदा बता कर ये कहना की पित्रोदा मेरे पिता के अच्छे मित्र थे.. एक माईंड गेम जातिगत राजनीति ही थी,उनके रहते सलमान का अल्पसंख्यक समुदाय को आरक्षण का लाँलीपाँप दिखाना क्या था?.. सत्यनारयण पित्रोदा जिनकों लोग अब सिर्फ सैम के नाम से जानते हैं,दूरसंचार क्रांति के जनक के रूप में जानते हैं,उनका नाम उनकी जाति के मद्देनजर ही इस्तेमाल किया गया)नाम इस्तेमाल कर भीड़ को संबोधित कर कहां गया ये जहां सब मंत्री बैठे हैं इन कुर्सियो पर वहां आप भी हो सकते हैं.. आप भी सैम बन सकते हैं ऐसा कहां गया.. | फिर भी राहुल को करारी हार मिली बल्कि खुले शब्दों में कहें तो एक शर्मनाक हार मिली.. सवाल उठने लगे की क्या गांधी परिवार के वारिस राहुल अब अपने इस कास्ट टाईटल का लाभ नही उठा पाएंगे.. क्या गांधी नाम का करिश्मा अब खतम हो चुका हैं..  ?

जहां पार्टी और सरकार आए दिन एक,एक कर क्राईसिस पर क्राईसिस झेल रहे हैं वहां युवराज का राजनीतिक करियर शुरू होने से पहले खतम होने की कगार पर हो तो मंत्रियो को इस डैमेज को कंट्रोल करना ही पड़ेगा.. कुछ ऐसा ही शुरू किया केंद्रिय सरकार के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने और बाकी कई नेताओं ने जो राहूल को अब पार्टी और सरकार दोनो में एक सक्रिय भूमिका निभाते देखना चाहते हैं..  दरअसल गांधी परिवार के इतिहास पर रौश्नी डालें तो नेहरू और इंदिरा के बाद एक भी ऐसा राजनितीज्ञ नजर नही आएगा जो खूद की मर्जी से राजनीति के अखाड़े में उतरा हो और नेहरू-इंदिरा जैसी बुलंद छवि काय़म करने में सफ़ल रहा हो..चाहें संजय की मौत के बाद राजीव हो या इंदिरा की मौत के बाद उनके पक्ष में बनने वाला एक भावुक माहौल.. ये भावुक्ता कुछ यूं उमड़ी थी की विमानों से ही अपने सपनों की उड़ान भरने वाले राजीव अब राजनीति के मैदान में उतर चुके थे.. उसके बाद सोनिया के साथ भी क्या हुआ इस से हम भलि भाति परिचीत हैं.. राहुल के पक्ष में ऐसा कोई भी भावात्मक माहौल नही बना जिससे सक्रिय राजनीति में उनका प्रवेश उनकी उदारता को दिखाए क्योंकि उन्होंने मौजूदा राजनैतिक पर्दे पर ऐसा कुछ नही किया जिससे जनता उनसे संभावनाओं की उम्मीद रखे.. उल्टा जब युवा सड़को पर सरकार की भ्रष्ट नीतियों के खिलाफ़ सड़क पर उतरता हैं वो नारे लगाता हैं-इस देश का युवा यहां हैं राहुल गांधी कहां हैं ?

अब राहुल ने सक्रिय राजनीति में उतरने के लिए अपनी ओर से हरी बत्ती तो दें दी हैं पर देखना होगा की दस सांसदो द्वारा सोनिया को भेजे पत्र में उन्हें लोकसभा में सदन का नेता बनाने की मांग स्वीकारी जाती हैं या कोई और रास्ता राहूल के लिए खोजा जाता हैं.. इन सभी घटनाक्रमों में एक बात जो गौर करने वाली हैं वो ये कि अगर राहुल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले अपने आपकों साबित नही कर पाते तो गांधी नाम का जादू अब फूंस हो जाएगा..  जाहिर तौर पर अब राहुल के लिए ये लड़ाई आर या पार का खेल हैं.. जहां कांग्रेस और सरकार में ही मौजूद एक बड़ा तबका उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर देखता हैं वही राहूल जनता की उपेक्षाओं पर क्या रंग डालते हैं ये ही तय करेगा कि आने वाले चन्द महिनो में 2014 के चुनावों की बिसात कैसे बिछती हैं.|