केंद्र में मोदी सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद से एक शख़्स को लगातार ललकारा जा रहा है।यह काम खुद सरकार से जुड़े बदज़ुबान सांसद,संगठनों के नेता कर रहे हैं।यह शख़्स कोई और नहीं बल्कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हैं।जिस महात्मा गांधी को कांग्रेस इस क़दर हाशिये पर धकेल चुकी थी कि उनके दिखाए रास्तों पर चलना तो दूर उनकी चर्चा महज़ रस्म अदायगी बन चुकी थी,आज उसी गांधी की सामाजिक,सांस्कृतिक प्रतिबद्धता को खारिज किया जा रहा है।आखिर,एनडीए सरकार के शुरूआती कार्यकाल में साबरमती का ये संत सबसे मजबूत विपक्ष कैसे बनता जा रहा है ? बापू पर बीजेपी सांसद साक्षी महाराज,आरएसएस का केरल से निकलने वाला मुखपत्र,मुंबई में विहिप की महासभा में साध्वी सरस्वती के हमले तो सिर्फ़ एक बानगी भर है।सुनियोजित ढंग से राष्ट्रपिता की छवि को अपनी सहूलियत के अनुकूल नायक,खलनायक में बदल कर नए तरीके से गढ़ा जा रहा है।असल में नरेंद्र मोदी बेशक देश और विदेश में महात्मा गांधी का गुणगान करें लेकिन उनकी सरकार से जुड़े अधिकांश समर्थकों,मंत्रियों,नेताओं के सोच का बापू के पवित्र विचारों से मुठभेड़ होना बेहद लाज़िमी है।क्योंकि,महात्मा गांधी ने जब से भारतीय राजनीत में प्रवेश किया तब ही से हिंदुत्व की राष्ट्रवादी राजनीति और कांग्रेस के अभिजातीय वर्ग को उनसे कड़ी चुनौती मिली है।बापू ने यूरोपीय राष्ट्रवाद की शहरी और अर्ध शहरी लोकप्रियता को तोड़ते हुए देश के दिल देहातों में दस्तक दी थी।
अपने एजेंडा की रूपरेखा पेश करते हुए उन्होंने पहली दफ़ा ही कांग्रेस अधिवेशन में अपना भाषण देते वक़्त डंके की चोट पर कांग्रेस के राजनैतिक आंदोलन को दिल्ली और मुंबई की शहरी राजनीति बताकर संगठन की किरकिरी कर दी थी। इस गांधी से शुरू-शुरू में कांग्रेस के अभिजातीय तबके तक को चुनौती पेश आई थी पर गांधी के नेतृत्व में आगे बढ़ने के सिवा कांग्रेस के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था।दूसरी तरफ़ अपने दौर के उफ़ान पर पहुंचे हिंदू राष्ट्रवाद के अधिकांश नेता भारत की सांस्कृति और सामाजिक विविधिता से कटे हुए थे इसलिए उनके कुम्बे में हड़कंप स्वभाविक था।बापू ने आस्था और धर्म में विश्वास को बनाए रखते हुए जिस सेकुलर भारत के ताने बाने को बुनना शुरू किया था उसमें वर्चस्व का तत्व मौजूद नहीं था। संघ परिवार के कारकुन अक्सर गांधी की हत्या को 'वध' कहते हैं और विश्व की मानवता के सबसे बड़े ज्योतिपुँज महात्मा गांधी की हत्या पर शौर्य दिवस तक मनाते हैं।गोडसे को राष्ट्रभक्त साबित करने के लिए अपने फॉर्मूला पर अमल करते हुए साज़िशन इतिहास को मनचाहे तरीके से पेश करने में अचूक राष्ट्रवादियों की बिग्रेड उन्हीं पर विभाजन की तोहमत मड़ती है।जबकि,हक़ीकत यह है कि गोडसे ने जो किया वो राष्ट्रप्रेम नहीं हिंदुत्ववाद की राष्ट्रवादी राजनीत थी जिसे गांधी से भय लगता था।
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नाथूराम गोडसे और महात्मा गांधी |
