Thursday, 3 October 2013

बीमारों का मसीहा !


साल 2008 था लक्ष्मी नगर में दिल्ली और भी आधुनिक होने के कगार पर थी कि निर्माणधीन मेट्रो स्टेशन का पीलर गिरने से दो मजदूरों की मौत हो गई तो चौदह बुरी तरह जख़्मी हो गए|मीडिया के कैमरा से लेकर सड़क से गुज़रते लोग ठहर कर इस दर्दनाक मंज़र को देखने लगे..हर तरफ से चीखपुकार की आवाज़ दिल को दहला रही थी.. घायल हुए मजदूर मदद के लिए करहा रहे थे |कुछ देर बाद उन्हें गुरू तेग बहादुर अस्तपाल ले जाया गया जहां जिस तरह का उपचार उन्हें मिला उसमे कई तरह की कई कारणों से खामियां थी..  जैसे, ज़रूरत की हर दवा का वहां मौजूद न होना,घायलों में ज्यादातर लोगों का गरीब तबके से होना,मीडिया की सक्रियता की वजह से हादसे में घायलों की संख्या कम दिखाना| इन सब बातों ने मेरी ज़िंदगी ही बदल कर रख दी.. ऐसा कहते हुए  कुर्सी पर बैठे एक राष्ट्रीय दैनिक अख़बर की कतरन में खुद की तस्वीर देखते हुए 'केसरिया रंग' की कमीज पहने 'ओमकार नाथ' मेरी ओर देखकर सवाल करते हैं कि घर में जब कोई दवा काम की नहीं रहती उसका क्या करते हो.. किसी गरीब को देते हो ?मुंह को न की मुद्रा में हिलाता हूं तो वो आगे कहते हैं बस ये ही मैं करता हूं.. जो दवा काम में नहीं आ रही होती उन्हें लेकर ज़रूरतमंदो को देता हूं.. वो आगे कहते हैं की दस साल की उम्र से चलने में सक्षम नही हूं फिर भी हौसलें किसी से कम नहीं.. आज सब मुझे प्यार से मेडीसिन बाबा के नाम से बुलाते हैं.. अपने इस अलग किस्म के प्रयास को याद करते हुए बाबा बताते हैं कि शुरूआती दौर में जब वो कोठियों में दवा मांगने जाते थे तब बाहर खड़े गार्ड उन्हें भगा देते थे,गलियों से "इस्तेाल में न आने वाली दवा दें दो" बोलते-बोलते जब वो गुज़रते थे तो लोग उन पर शक करने के साथ उन्हें भिखारी तक कह देते पर छ:साल के इस सफ़र ने आज समाज में उन्हें एक अलग मुकाम पर पहुंचा दिया|अब लोग बिन मांगे उनकी मदद करने को आगे आते हैं|अपना एक थैला खोल कर वो विदेश से आ रहीं दवाओं के पार्सल भी दिखाते हैं जिसमें हाँग काँग से लेकर इंगलैंड तक से आई मदद का पता चलता हैं



ये सचमुच सरहानीय हैं कि बाबा दिल्ली भर के अलग-अलग सरकारी अस्तपतलों में जा कर ज़रूरतमंद मरीजों को छाट उनके डॉक्टरों से समन्वय स्थापित कर उनकी मदद करते हैं और काम में आने वाली दवा उपलब्ध न होने पर भी अगले दिन इंतज़ाम कर लाने का वादा करते हैं|बाबा ने दवा इक्कट्टी करने के लिए एक कमरा किराए पर भी ले रखा हैं जिसका वो लगभग दो हज़ार रूपय किराया देते हैं,यही पर एक छोटा फ्रीज भी मौजूद हैं जो गूँज नाम के एक गैर सरकारी संस्थान ने उन्हें दिया|दवाओं पर लेबल देखने के लिए बाबा ने तकरीबन चार सौ आतशी शीशें भी अपने पास रखे हैं|एक वकील ने उन्हें सलाह दी कि इस तरह से दवा जमा करने से छापा भी पड़ सकता हैं इसी वजह से उन्होंने डॉक्टर एसएल जैन राजेंद्र नगर और नसीम मतिया महल जैसे कई अस्पतलों से करार भी किया और उन्हें वक़्त-वक़्त पर निरीक्षण के लिए बुलाया|हफ्ते में चार दिन दूसरों के अभावों को दूर करने की खातिर सुबह से रात तक दवा इक्कट्टी करने वाले बाबा खुद पहले तेरह साल तक एक बल्ड बैंक टेक्निशीयन थे|आज पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी के साथ-साथ समाज के हाशिए पर धकेल दिए गए वर्ग के लिए भी वो प्रयासरत हैं|घर में जब बाबा से बात हो रही थी परिवार के बाकी सदस्य बाहर गए थे सिवाय नाति के जिसे अपने नाना पर बहुत गर्व हैं|शाहरूख कहता हैं कि इस उम्र में जब सबके नाना घर में बैठ जाते हैं मेरे नाना इतना नेक काम कर रहे हैं|बाबा के पास रखा एक दवा का बक्शा खोल शाहरूख बताता है कि बक्शें में एक रूपय की सर दर्द की दवा से लेकर कैंसर तक की दवा उपलब्ध हैं| जिसके बाद बाबा कहते हैं कि दवा तो और महंगी भी हैं पर अभी भी काम करने के लिए काफ़ी ज़रूरतें हैं जिसमे एक मेहनतकश टीम सबसे पहली ज़रूरत हैं|




ओमकार नाथ (मेडिसिन बाबा)



बाबा कहते हैं मैं लोगों से कहूंगा महीने में तीस दिन खुद को देते हैं कम से कम एक दिन समाज को भी दीजिए.. नहीं कहता मुझे दीजिए खुद निकलें घरों से बाहर और देखे मुफलीसी कहीं न कहीं आपका सर शर्म से झुकाने को मौजूद होगी|हां,आपको बहुत चीज़े ऐसा करने से रोकेंगी जैसे मुझे भी शुरूआत में मेरे ही परिवार में मेरी पत्नी ये कहकर रोकती थी कि ये मांगना ठीक नहीं पर जिस दिन नव भारत में मेरी तस्वीर छपी उसने भी कहा कि ज़रूर मैं कोई अच्छा काम कर रहा हूं|अब घरवाले खुद मुझे टीवी पर देखते हैं तो खुश होते हैं मुझे भी स्टूडियो में जाने पर मालूम चला कि वहां पाउडर लगाकर बैठना पड़ता हैं|इस बीच बाबा को एक फोन आया मालूम हुआ कि उन्हीं के मौहल्ले में किसी बच्ची की तबीयत ख़राब हैं जिसके लिए उन्हें पास के ही एक अस्पताल जाना होगा|उस रोज़ उनकी खुद की तबीयत न ठीक होने के बावजूद उन्होंने फोन पर वादा किया कि वो अभी सीधा अस्तपताल पहुंच रहे हैं मेरे पूछने पर कि आप कैसे जाएंगे उन्होंने अपने सफ़ेद पड़ चुके बालों पर हाथ फेरते हुए,झुरियां पड़ चुकी आँखों से मेरी ओर देख कहा बीटियां कहेगी बाबा ज़रूरत पड़ने पर नहीं आया.. मुझे जाना होगा बेटा.. और मैं यह देख चकित था कि एक ऐसे समय में जब भाई-भाई का नहीं,पुत्र पिता का नहीं,खून-खून का नहीं.. पचास से ऊपर की उम्र के ये बुजुर्ग जिनके खुद के इक्कतालिस वर्षीय पुत्र मानसिक तौर पर बीमार हैं समाज के लिए जी-जान से अपने खून का कतरा कतरा देने को तैयार हैं|ओमकार जी का मेडीसिन बाबा बनना इसलिए भी काब़िले तारीफ हैं चूंकि विश्व स्वास्थ संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 649 नागरिकों की दवाओं तक कोई पहुंच नहीं|ऐसे में बाबा पांच से दस लाख रूपय की दवाएं समाज से मिल रही मदद और अपनी कमीज पर लिखे अपने मोबाईल नंबर 9250243298 के जरिए एकत्रित कर इसे बारह दानशील अस्पतालों तो दो सरकारी अस्पतालों में दे रहे हैं| यदि,आज मनोज कुमार रोटी,कपड़ा,मकान, का अगला भाग बनाते तो ज़रूर इस कड़ी में दवा भी जोड़ते|