शासन बदल जाने से मानसिकता नहीं बदलती|ब्रिटिश हुकूमत के दौरान पुलिस किस तरह से सत्ता तंत्र के बाबुओं की जी हुजूरी में लगी रहीं इस बात से शायद ही कोई अपरिचित हो| देश-भर में पुलिस के मूल चरित्र को लेकर यह बात आज भी अनेकों-अनेक उदाहरणों के जरिए सटीक बैठती हैं|जनता की सेवक कम और खुद को शासक अधिक समझती है पुलिस|अभी दिल्ली की सड़कों पर एक पुलिस अफ़सर की रिवॉल्वर से 'करण' नाम के बीस वर्षीय युवा की मौत हो गई और उसके दोस्त पुनीत की हालत नाजुक बनी हुई हैं| क्या,हर वक़्त हमारी सुरक्षा में तत्पर रहने वाली पुलिस के लिए हवा से बातें करने वालें ये बाइक सवार इतनी बड़ी आफ़त बन गए थे कि बौखलाहट में इन शूर वीरों को गोली चलानी पड़ी?हम सब जानते है कि बाइकर्स जत्थों में सालों से इसी तरह गैंग बनाकर तफ़री काटते हैं|हां,पिछले एक महीने भर से इन्हें ज्यादा सक्रिय देखा गया |इस बात में भी शायद ही दो मत हो कि लगातार दिल्ली की वीवीआईपी सड़कों को अपने वाहनों से मौत का मार्ग बना डालने वालें स्टंटबाज़ों के इस कातिलाना जुनून का सड़क यातायात में कई बेगुनाह भी शिकार होते रहते थे|
इन उपर्युक्त पहलुओं के साथ 'दिल्ली पुलिस' और उसका बचाव कर रहें कुछ लोगों की दलील अप्रत्यक्ष रूप से इस निंदनीय घटना का ये ही कहकर संरक्षण कर रहे है कि कुछ न कीजिए तब दिक्कत और कुछ कीजिए तब दिक्कत!आखिर पुलिस करें तो क्या करें?साहेब,अगर कानून व्यवस्था बनाए रखने का मतलब हुड़दंगियों को गोली मारने से हैं तो रहने दीजिए ऐसा ही जस का तस|सवाल आपसे ये होने चाहिए कि लगातार ये लड़के बेखौफ़ कैसे हवा को चीरते हुए खुद की और दूसरों की जान को ख़तरे में डाल अपनी आधुनिक बाइकों को हुड़-हुड़ कर रॉकेट की तरह गतिशील नज़र आते थे?30 से 35 युवाओं का जत्था किस तरह से अशोका रोड जैसे वीवीआईपी इलाकों में घुस जाता है और पुलिस के बैरीकेंडिग तक इनके आगे बेअसर साबित होते हैं?क्या पुलिस का रिश्वत खौऊ चरित्र कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते लोगों के लिए धार का काम नहीं करता|आप रोज़ाना की सामान्य बोलचाल में भी देख लीजिएगा बिना हेल्मेट तो छोड़िए इतना तो गांव में इलाके के इस्पेक्टर के साथ हुक्का पीते-पिलाते बातचीत बन जाती हैं.. लोग दो पहिया वाहनों की सीट पर सीमा से अधिक संख्या में लदकर बाइक-स्कूटर आराम से चलाते है क्योंकि या तो जेब में ठीक-ठाक रूपय पड़े होते है|
बहरहाल,इस बात को सोचकर भी दिल पसीज जाता है कि कोई हाड़ मांस का इंसान भावनाविहीन हो कर ग़लत रास्ते पर चल रहें युवकों से निपटने का फॉर्मूला गोली सुझा सकता है या एक मौत को जाय़ज ठहरा सकता है?आप इन युवकों को समाज की सड़ांध मान सकते हैं पर मैं नहीं मानता.. हां,ये जानते हुए कि ये लोग कानून-व्यवस्था को धत्ता बता जाते थे|मेरे मुताबिक 'सख़्ती' और 'तानाशाही' में अंतर होता हैं|जो उस रात पुलिस ने किया वो सख़्ती नहीं वर्दी की तानाशाही का ही एक सुरक्षित रूप था|1857 के पुलिस अधिनियम पर टिकी हमारी पुलिस आज भी जनता की दोस्त नहीं बन सकी हैं|हां,बाबू लोगों का आदेश पालन भलि भांति होगा|मुझे नहीं मालूम पहले इस तरह से कोई अभियान चलाया गया कि नहीं या इस तरह के अभियान को चलाने में क्या-क्या कठिनाई पेश आ सकती थी पर होना य चाहिए था कि पुलिस इन युवाओं की जानकारियां जुटाती और इनके घर तक जाती क्योंकि अमूमन इन बाइकर्स के घर में इत्ती जानकारी रहती है कि दोस्तों के साथ घुमने जाता हैं वगैरह वगैरह पर जान को एक मशीन के भरोसे दाव पर लगाता है ये भी मालूम हो कहा नहीं जा सकता|अलग-अलग जगह पोस्टर्स-बैनर के जरिए युवाओं-बुजुर्गों को जागरूक किया जाता कि कैसे भारत सड़क दुर्घटनाओं के लिहाज़ से सबसे ऊपर रिकॉर्ड बनाए हुए हैं और कैसे आपके सहयोग से यहां हमने खुद को शून्य करना हैं|रफ्तार का शिकार हुए अजरूद्दीन के बेटे अयाजुद्दीन या उसके जैसे अनेक युवा जो एक अच्छी ज़िंदगी जी सकते थे पर रफ्तार ने किस तरह उनकी साँसें छीन ली इस पर विशेष रूप से पुलिस द्वारा स्थानीय स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं|