Sunday, 24 March 2013

एक क्रांतिकारी का दूसरें क्रांतिकारी साथी को पत्र


भगत सिंह ने जब असेंबली में बम्म फेंक कर अंग्रेजी हुकूमत को देश के नौजवानो की ताक़त दिखाने का प्रस्ताव रखा. उसी दौरान असेंबली में 'ट्रेड डिस्पयूट' 'पब्लिक सेफ्टी', बिल भी आने थे जो कि क्रांतिकारियों एवं मजदूर यूनियन की आवाज़ दबाने का एक सख्त कदम था.तब सोशलिस्ट रिपब्लिक्न पार्टी ने उन्हें असेंबली जाने से रोका जिसका कारण शायद संगठन में भगत की भूमिका रहा हो.लेकिन,भगत के नज़दीकी सुखदेव की सोच संगठन और चंद्रशेखर आज़ाद से कुछ विपरीत थी. उनका कहना था कि इस ऐतिहासिक काम को भगत जैसा क्रांतिकारी ही सफलतापूर्वक अंजाम दे सकता हैं.भगत और सुखदेव के बीच हुई नोकझोक के बाद जब भगत ही इस कार्यवाही के लिए चुने गए तब क्या लिखा पत्र में उन्होंने सुखदेव के लिए पढ़े यहां-
प्रिय सुखदेव,
जब तक तुम्हें यह पत्र मिलेगा, मैं जा चुका होऊंगा-दूर एक मंजिल की तरफ. मैं तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आज बहुत खुश हूं. हमेशा से ज्यादा. मैं यात्रा के लिए तैयार हूं, अनेक-अनेक मधुर स्मृतियों के होते और अपने जीवन की सब खुशियों के होते भी, एक बात जो मेरे मन में चुभ रही थी कि मेरे भाई, मेरे अपने भाई ने मुझे गलत समझा और मुझ पर बहुत ही गंभीर आरोप लगाए- कमजोरी का. आज मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं, पहले से कहीं अधिक.
आज मैं महसूस करता हूं कि वह बात कुछ भी नहीं थी. एक गलतफहमी थी. मेरे खुले व्यवहार को मेरा बातूनीपन समझा गया और मेरी आत्मस्वीकृति को मेरी कमजोरी. मैं कमजोर नहीं हूं. अपनों में से किसी से भी कमजोर नहीं भाई! मैं साफ दिल से विदा होऊंगा. क्या तुम भी साफ होगे? यह तुम्हारी बड़ी दयालुता होगी, लेकिन ख्याल रखना कि तुम्हें जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए. गंभीरता और शांति से तुम्हें काम को आगे बढ़ाना है, जल्दबाजी में मौका पा लेने का प्रयत्न न करना. जनता के प्रति तुम्हारा कर्तव्य है, उसे निभाते हुए काम को निरंतर सावधानी से करते रहना.
तुम स्वयं अच्छे निर्णायक होगे. जैसी सुविधा हो, वैसी व्यवस्था करना. आओ भाई, अब हम बहुत खुश हो लें. खुशी के वातावरण में मैं कह सकता हूं कि जिस प्रश्न पर हमारी बहस है, उसमें अपना पक्ष लिए बिना नहीं रह सकता. मैं पूरे जोर से कहता हूं कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर हूं और जीवन की आनंदमयी रंगीनियों ओत-प्रोत हूं, पर आवश्यकता के वक्त सब कुछ कुर्बान कर सकता हूं और यही वास्तविक बलिदान है. ये चीजें कभी मनुष्य के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह मनुष्य हो. निकट भविष्य में ही तुम्हें प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाएगा.
जहां तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं यह कह सकता हूं कि यह अपने में कुछ नहीं है, सिवाए एक आवेश के, लेकिन यह पाशविक वृत्ति नहीं, एक मानवीय अत्यंत मधुर भावना है. प्यार अपने आप में कभी भी पाशविक वृत्ति नहीं है. प्यारतो हमेशा मनुष्य के  चरित्र को ऊपर उठाता है. सच्चा प्यार कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता. वह अपने ही मार्ग से आता है, लेकिन कोई नहीं कह सकता कि कब. एक युवक और एक युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और अपने प्यार के सहारे आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं, अपनी पवित्रता बनाए रख सकते हैं. मैं यहां एक बात साफ कर देना चाहता हूं कि जब मैंने कहा था कि प्यार इंसानी कमजोरी है तो यह एक साधारण आदमी के लिए नहीं कहा था. आम आदमी जिस स्तर पर होते हैं, वह एक अत्यंत आर्दश स्थिति है. जब मनुष्य प्यार व घृणा इत्यादि के आवेगों पर काबू पा लेगा, जब मनुष्य अपना आधार आत्मा के निर्देश को बना लेगा, वह स्थिति मनुष्य के लिए अच्छा और लाभदायक होगा.
क्या मैं यह आशा कर सकता हूं कि किसी खास व्यक्ति से द्वेष रखे बिना तुम उनके साथ हमदर्दी करोगे, जिन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत है? लेकिन तुम तब तक इन बातों को नहीं समझ सकते जब तक तुम स्वयं उस चीज का शिकार न बनो. मैं यह सब क्यों लिख रहा हूं? मैं बिल्कुल स्पष्ट होना चाहता था. मैंने अपना दिल साफ कर दिया है.
तुम्हारी हर सफलता और प्रसन्न जीवन की कामना सहित,
तुम्हारा भाई