26 जनवरी 1950 हम सब ही देशवासियों के लिए ख़ासा महत्व रखता हैं.इसी दिन भारत का संविधान लागू हुआ था और तमाम समाजशास्त्र से जुड़े विद्वानों की वह चुनौती मुंह बाये खड़ी थी कि भारत की विविधता उसका आकार-प्रकार ऐसा हैं कि इसके एक राष्ट्र बनें रहने की संभावना काफ़ी कम हैं.यदि,यह एक राष्ट्र रहता भी हैं तो अलगाववादी तत्व और कुछ निरंकुश शक्तियां इस के गणतंत्र को समाप्त कर देगी.सभी बुद्धजीवि स्वतंत्र भारत के गण और तंत्र को लेकर इतनी शंका में थे कि इसे एक अस्वभाविक राष्ट्र का दर्जा दिया जाने लगा.इन्हीं चुनौतियों को मुंह तोड़ जवाब देते हुये हम दिनांक 'पच्चीस जनवरी' को गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर अपने काँलेज आईसोम्स में ही इस खुशी के मौके पर तैयार थे भारत के 64 वे गणतंत्र पर अपनी-अपनी बात रखनें और इस पर गर्व महसूस करने को.इस कार्यक्रम को आरम्भ करते हुये मंच की कमान संभाली बीएमसी के छात्र 'प्रकाश' ने.वही छात्रों को सुनने एवं अपने विचार प्रकट करने के लिए वहां मौजूद थे काँलेज के ही आदरणीय शिक्षक गण.सबसे पहले अपनी बात और गणतंत्र दिवस की मुबारक़बाद देने मंच पर प्रथम वर्ष बीएमसी की छात्रा 'अकांक्षा' आयी जिन्होंने सब अच्छा होने की कामना करते हुये महिलाओं को उनके हक़ मिलें इस बात पर जोर दिया.ऐसे ही प्रथम वर्ष के छात्र 'हर्ष' ने अलग ही नजरियां पेश करते हुये भ्रष्टाचार की सफ़ाई के साथ-साथ देश को साफ़ रखने की बात कही.उन्होंने व्यंग्य शैली में कहा-"हम यहां भाषण दें कर नीचे उतरते ही सब भूल जाते हैं".इसी बात को आगे बढ़ाते हुये द्वतिय वर्ष बीएमसी से 'उर्वषी' और काँलेज के बहुत से छात्रों ने स्वयं की आत्मशुद्धी की मांग पर बल दिया.
जब विचारों के आदान-प्रदान के बीच माहौल बेहद गम्भीर होने लगा था तो एमएमसी के छात्र 'सुशांत' ने अपनी आवाज़ के जरिए सरहद पर खड़े उन जवानों की याद दिलाते हुये सब को एक सुर में वह गीत गाने के लिए तैयार कर दिया जिसके शब्द हैं-'बस इतना याद रहें,एक साथी और भी था'.भावात्मक माहौल के बावजूद गौर करने वाली मुख्य बात यह रही कि देश के प्रति श्रद्धा-भाव रखने के साथ साथ समारोह में रहें कुछ छात्रों जैसे एमएमसी के 'विकल्प त्यागी' ने मौजूदा विकास के पैमाने पर सवालियां लहजे में प्रश्न चिन्ह लगाते हुये कहा-हमें तय करना होगा के हम विकास की ओर तेज़ी से अग्रसर हैं लेकिन यह विकास भी हमें अनिवार्य रूप से चाहिए तो किन शर्तों पर ? क्या यह विकास किसी गांव,जंगल को उजाड़ कर किया जाएं तो हमें यह स्वीकार होगा ?कुछ इसी तल्ख लहजे में 'रौनक' ने भारतीय समाज के जाति-धर्म के आधार पर आपस में विभाजित होने को लेकर चिंता जताई.'अंकित मुत्त्रीजा' ने देश के आखिरी नागरिक की आवाज़ सुनी जाएं इस बात पर जोर दिया और कहा कि गण का वर्तमान राजनीति में ख़ासकर युवाओं का हस्तक्षेप करते रहना बहुत ज़रूरी हो गया हैं यदि ऐसा नही होता तो दुर्भाग्यवश हमारा तंत्र उसे नज़रअंदाज कर देता हैं.इन्हीं बातों में शायद देश के सामने मौजूद चुनौतियां भी झलक रही थी जिसका जवाब तलाशना अहम हैं.कार्यक्रम के दौरान ही खाने की व्यवस्था हुई तब भी छात्रों ने पहले इन गम्भीर मसलों पर बात करना अपनी प्राथमिकता में शामिल करते हुये वार्तालाप का सिलसिला जारी रखा.'अंकुर' ने निजी स्वार्थ को किनारे कर देश की उन्नति में सहयोग देने की बात कही तो वही 'नमन' ने दो टूक कहा-बात करने से बेहतर हैं,मैं देश के लिए कुछ अच्छा करें.. क्यों न अभी से,यही से ?
देश के प्रति सम्मान-भाव और उसके भविष्य से जुड़ी आकांक्षाओं,उम्मीदों के बीच देश की राजधानी दिल्ली में हुई 16 दिसंबर की वह जघन्य घटना का जिक्र बार-बार छिड़ा जिसने देश को झकझोर दिया.सवाल यह भी उठा कि राजधानी दिल्ली में हर वर्ष होता शक्ति प्रदर्शन और हमारे सैनिकों का मान क्यों यहां से निकलकर पूर्वोत्तर के राज्यों में भी नही जाता.एक छात्र ने इन्हीं बातों के बीच हंसी के ठहाके यह कह कर लगवा दिए की ये देश वीर जवानों का हैं,हमें मालूम भी हैं लेकिन सिर्फ गणतंत्र दिवस से दो दिन पूर्व ही क्यों यह गाने बजते हैं,बजते भी हैं तो इतनी तेज़ ध्वनि में क्यों कि दूसरों को परेशानी हो.?तब बच्चों की हंसी रूकी ही थी कि हमारे शिक्षक श्री 'विवेक त्रिपाठी' मंच पर आएं और देश के युवाओं से अपेक्षाएं हैं कहते कहते भारत का गणंतंत्र और उसकी खुबियों पर बतातें-बतातें उन्होंने वर्तमान स्थिति को चिंता जनक बताया और कहा कि अधिकारों की लड़ाई अब शायद आंतरिक जनविरोधी ताक़तो से हैं.तुंरत बाद बच्चों ने उनसे उनकी प्रसिद्ध कविता सुनाने का आग्रह भी कर डाला जिसके लिए वह मना भी न कर सकें.कविता का आनंद उठाठे हुये छात्र वाह-वाह और तालियां भी बजाने लगें.जिसके बाद श्री.'अरिंदम' ने अच्छा नागरिक बनने से पहले एक अच्छा इंसान बनने की बात कही.अंत में काँलेज के डायरेक्टर श्री. 'अंबरीश सक्सेना' ने अपनी बात रखी और कहा-मुझे अच्छा लगा सब बच्चो ने मिलकर यह कार्यक्रम आयोजित किया और लोकतंत्र/गणतंत्र में सबसे ज्यादा ज़रूरी हैं कि हर इंसान अपनी बात रखें जैसा यहां भी हुआ.
उन्होंने कहा लोकतंत्र सोए नही ज़िंदा लोगों का तंत्र हैं.जनआंदोलन से ही परिवर्तन आता हैं और पिछले डेढ़ दो साल से जो कुछ भी हुआ वो एक स्वस्थ लोकतंत्र की तरफ आशन्वित करता हैं.अब यह मंच और कक्षा आप ही लोगों की यह गीत,कविता,चर्चा,जो करना चाहें करे लेकिन ध्यान रहें युवाओं को ही देश की दशा और दिशा तय करनी हैं.इन्हीं बातों के साथ समारोह समाप्त हुआ और ब्रहमदेव भाई के हाथों से दिए जा रहें समोसे,लड्डू,चाय के साथ छात्रों ने कार्यक्रम को यहां पर विराम दिया.|