हम लोगो की यादाश्त इतनी कमज़ोर होती हैं कि चाहें वो किसी मंत्री द्वारा किया गया कोई घोटाला हो,किसी पार्टी द्वारा चुनावों में किये गए वायदें..या फिर किसी महिला के साथ हुई बदसलूकी.हम सब भूल जाते हैं..भले घटना के वक्त फेसबुक पर चर्चा करना हो ,अपना आक्रोश दिखाना हो या बदस्लूकी की मार्फत इतना मानसिक तौर पर प्रभावित होना के हम अपने आस-पास में रह रहे हर एक मर्द से घृणा करने लगते हैं ..
(ऐसा हाल में गुवाहाटी मामलें के बाद भी देखा गया जब स्त्रीयों का गुस्सा संचार के विभन्न माघ्यमों से बाहर आने लगा)आज इतना आधुनिक हो जाने के बावाजूद भी हमने अपनी पुरूष प्रधान सोच,विचार को इतना अड़ियल बना लिया के सूचना क्रांति के इस युग में उसे(स्त्री) फोन रखकर मार्केट जाने की मनाही हो जाती हैं,किसी स्त्री के साथ कोई मर्द दुष्कर्म करे तो देखा जाता हैं.. 'ये दुष्कर्म कितने बजे हुआ' ? रात में हुआ,तो सीधा सीधा उस महिला को दोषी बना दिया जाता हैं जो पहले से पीड़ित हैं.शहर में रह रही युविका यदि देर रात घर आती हैं तो मोहल्ले में उसे लेकर चालचलन की बातें गढ़ना आम हैं.. कोई मतलब नही कि कैसी परिस्थितियों के मद्दे नज़र वे युविका ऐसा कर रही हैं,या आपके खुद के घर में आपका हुनहार पुत्र कई दिनो तक नदारद रहता हो,क्योंकि उसे तो कंपनी की तरफ से किसी काम के सिलसिले में बाहर जाना पड़ गया,वो घर चलाता हैं..उसका और आपका पेट हैं जो रोटी मांगता हैं,शरीर हैं जो खुली हवा चाहता हैं..एक स्त्री को भला इन सब चीज़ो की क्या जरूरत..एक स्त्री की सारी परेशानी शायद वही से शुरू हो जाती हैं जब वो पैदा होती हैं इस गोल संसार में योनि लिए. यही अंग तय कर देता हैं उसकी आगे की पूरी जिंदगी को.. हम अपने घर के भीतर झांकते हैं तो मां,बहन,बीवी, आदि के रूप में हमे इसी स्त्री की सुरक्षा,आजादी अहम लगने लगती हैं..पर जब यही स्त्री सड़क पर चल रही हो या बस में धक्के खा रही हो,तो हमे बदचलन लगती हैं.. हम सवाल उठाते हैं कि ऐसे माहौल में जहाँ इंसान-इंसान को खा जाता हैं ये छोटी स्कर्ट पहने बाहर क्यो घूम रही हैं.?ये ऐसा मानसिक प्रहार होता हैं हमारे समाज पर जो धीरे धीरे किसी ना किसी रूप में एक दिन स्वतंत्रता पर लगाम कसने में सार्थक साबित होता हैं .. दरअसल ऐसे मामले जिसमें एक स्त्री को प्रताड़ित किया जाता हैं,उसका बल्तकार किया जाता हैं... इनकी सूची इतनी लंबी हैं के आपको जानवरो के प्रति संजिदगी उत्पन करने वाले तमाम खबरिया चैनल हल्के लगने लगेंगे .. अमेरिका में एक सर्वे हुआ तो पाया गया के पीछले दस सालों में भारतीय अखबारों के अनुसार तकरीबन 150 लड़कियों पर तेज़ाब फेका गया..|
स्त्री और पुरूष दो ऐसे सत्य हैं जिनके बिना संसार की कल्पना करना तक असभंव हैं,दोनो एक दूसरे के बिना अधूरे हैं.. फिर जब यहाँ ऐसी स्थिति हो कि दस से बीस हैवान मिलकर एक सौलह साल की बच्ची को पीटे उसके कपड़े फाड़े,सारी भीड़ एक जमावड़ा बनके मूख दर्शक बनी रहे , हम किस चीज की उम्मीद रखना जाय्ज समझ सकते हैं ऐसे समाज से .. जब स्त्री पूरूषो के कारण ही आसुरक्षा का भाव महसूस करने लगे तो क्या यह कहना गलत नही होगा के खूखार जानवरों को नही ऐसे पुरूष प्रधान समाज को कहना जाय्ज हैं जो आगे कुछ और पीछे कुछ होता हैं.. जहाँ स्त्री पूजी देवी समान जाए और वास्तीविकता में उसे सिर्फ प्रताड़ित किया जाए.. हमारे ग्रंथो में पुराणों में भी वो सहती और सिर्फ सहती आयी हैं.. जब गुवाहाटी में एक बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ तब मैंने देखा के कई स्त्री विमर्शकारी महिलाए हैं जो धड़ले से अपना खेमा बना रही हैं मर्दो के विरोध में.. जिन मर्दो को स्त्रीयों की सुरक्षा के लिए तत्पर रहना चाहिए वो इसमें असफल रहे जब ही लगभग आधे घंटे तक कुछ हैवान मिलकर इस कुकृत्य को साहस से करते रहैं .. |
शुरूवात में मुझे लगा के इन लोगों को जिन्होंने इसे घिनौनी हरकत को होते हुये देखा उन्हें मानवता के अधिन ही क्यो माना जाए.. ? पर नही बाद में मेरी सोच में परिवर्तन आया.. मुझे महसूस हुआ कि अगर वो लोग जिन्होंने इस कुकर्म को खुली आंखो से देख कर भी प्रतिरोध की भावना को स्वर नही दिया,आगे नही बढ़ सके,ऐसे पिशचों को सबक नही सिखा सके ...जिन पर सारा जमाना थू थू कर रहा हैं,तो उन मूख दर्शक पर कौन सा गर्व करना चाहिए..?दरअसल बहुलता देखे तो मालूम चले के पहली महिला आईपीएस अफ्सर,पहली महिला राष्ट्रपति आदि आकड़ो के बावाजूद भी हम आज भी कई यूग कई सदी पीछे चल रहे हैं .. गुवाहाटी में बच्ची के साथ जो हुआ उससे वो जितना प्रताड़ित हुई उससे अधिक जांच के लिए घटित भेजी 'महिला आयोग' की टीम से हुई होगी.. एयरपोर्ट पर पहुंची टीम इस सलीखे से तस्वीरों के साथ अखबारों पर आई जैसे वो इतने संवेदनशील मसले पर कारवाई करने हेतु नही अपितु पिकनिक के लिए गुवाहाटी गई हैं.. इतना ही नही राष्ट्र शर्म की बात तब हुई जब टीम में शामिल सदस्य 'अलका लाम्बा' ने पीड़ित बच्ची की पहचान मीडिया के आगे सार्वजनिक कर दी.उसके बाद उन्हें टीम से निकाल दिया गया..पर क्या वो खूद उन अपराधियों जितनी दोषी नही हैं,जिन्होंने बच्ची के साथ ऐसा हैवानी व्यवहार किया.? जब कोई महिला बल्तकार जैसी साजिश का शिकार बनती हैं तो उससे अधिक पीड़ा उसे तब होती हैं जब उसकी पहचान जाहिर की जाती हैं,इसलिए पीड़ीत की पहचान सार्वजनिक करना गैर कानूनी हैं..
इतना ही नही जब बल्तकार की शिकायत होती हैं तो किस प्रकार बिना अनुमती के कोई जांच यंत्र उसकी योनि में घुसेड़ दिया जाता हैं और नर्स या बाकी अधिकारी.. जब उसे बल्तकार पीड़ित कह,कह कर,उसकी आत्मा तक रौंद देते हैं.. सही मायनों में तब उसका समाजिक कत्ल होता.. ऐसा आप कुछ माह पहले की एक तहलका रिपोर्ट में भी पढ़ सकते हैं..सोच का विषय यह भी हैं कि कैसे "पुलिस और आम लोगो" के बीच भरोसे का पुल बनाया जाए.. वो भी तब जब लखनाऊ के एक थाने में ही पुलिस द्वारा कैदी महिला के साथ जोर जबरदस्ती का मामला सामने आएं.. गुवाहाटी में कुछ दरिंदे मिलकर सरे आम छाती चौड़ी कर देश की इज्जत को रौंद रहे हो,आधे गंटे तक रौंदते रहे.. उसके बाद भी सभी आरोपी कई दिनों तक हत्थे ना चड़े,पुलिस अधिकारी खुद महिलाओ के पहनावें को दोषी मानते हो,उत्तेजनक करार करते हो..| उस मीडिया का भी क्या कहें.. जिसके संपादक रात को बार(पब)जाने वाली अधिकांश लड़कियो को वैशया कह कर पुकारे(गुवाहाटी मामले के बाद ही वही के एक स्थानीय चैनल के एडीटर द्वारा कहीं गई बात)दरअसल इस बार हमें हमेशा की तरह ऐसी दुखद घटना से आगे तो बढ़ना ही हैं ,बढ़ना होगा भी पर इन सभी चीज़ो को भूले बिना| याद रखना होगा एक,एक बात को और जरूरी हैं कि सार्वजनिक जीवन में भी हम सतर्क रहे सिर्फ अपनी बहन,बेटी,प्रेमिका के लिए नही बल्कि इस पूरे समाज के लिए और किसी विकृत मानसिकता को फलने फूलने ना दे कर,उसका विरोध करे चाहें वो हवस भरी नज़रो से मेट्रो में किसी महिला को किसी पुरूष द्वारा घुरना हो या बस की भीड़ का लाभ उठाये चिपकना ..अभी भी वक्त हैं एक बहतर समाज को विकसित होने देने का .. |