गांधी परिवार के युवराज को लेकर काफ़ी समय से चली आ रही सक्रिय राजनीति की मांग अब धीरे धीरे साफ होती जा रही हैं.. 2004 से अमेठी लोकसभा से सांसद बने राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत अपने पिता स्वर्गीय राजीव गांधी के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र(अमेठी)से की. फिर यही सिलसिला उन्होंने 2009 के लोकसभा चुनाव में बरकरार रखा और इस बार निकटम प्रतिद्वंद्वी को 3,33,000 वोटों के अंतर से पराजित कर उत्तर प्रदेश के अमेठी को अपना निर्वाचन क्षेत्र बनाएं रखा.. इसी उत्तर प्रदेश को आगे चल कर उनके राजनीजिक भविष्य से जोड़ कर देखा जाने लगा.. जहां लंबे समय से कांग्रेस मूहं की खाती आई.. वही की जिम्मेदारी उनके कंधो पर सौपी गयी.. उन्हें उत्तर प्रदेश 2012 विधानसभा चुनाव एक स्टार प्रचारक और मुख्य रणनीतिक नेता के रूप में दिया गया.
राहुल ने बेहिसाब रैलियां,सभाएं की.. उसके बावजूद अपनी जमीनी स्तर की सक्रिय राजनीति के लिए पहचाने जाने वाले राहुल,उत्तर प्रदेश 2012 विधानसभा चुनाव में विफल रहे.. पार्टी छ: सीटे अधिक तो लें पाई पर उपेक्षाओं पर खड़ी नही उतर पाई. यदि पार्टी यहां अच्छा करती जैसे की कयास लगाए जा रहे थे, और नंबर 3 पर भी आती तो संभव था की तब ही से राहुल का रास्ता एक बेहद ही बड़े और महत्वपूर्ण पद के लिए खोला जाता.. पार्टी के अधिकांश नेताओं ने इस हार का दाग राहुल पर नही लगाना ठीक समझा.. चाहें हार के कारणों पर विचार विमर्श करने वाली एंटनी कमेटी हो,सब ने उन्हें क्लीनचिट दीं पर स्वंय राहुल ने इस हार को खूद की विफलता से जोड़ कर मीडिया के समक्ष कबूल किया.स्थिति साफ थी अपने राजनीतिक करियर की शुरू्आत के साथ जातिगत राजनीति का सफ़ाया हो,कहने वाले राहुल खूद जातिगत राजनीति का कार्ड चल कर भी खाली निराशा लिए यूपी से वापस लौटे.
(यूपी के रमानगर में सैम पित्रोदा का असली नाम सत्यनारण गंगाराम पित्रोदा बता कर ये कहना की पित्रोदा मेरे पिता के अच्छे मित्र थे.. एक माईंड गेम जातिगत राजनीति ही थी,उनके रहते सलमान का अल्पसंख्यक समुदाय को आरक्षण का लाँलीपाँप दिखाना क्या था?.. सत्यनारयण पित्रोदा जिनकों लोग अब सिर्फ सैम के नाम से जानते हैं,दूरसंचार क्रांति के जनक के रूप में जानते हैं,उनका नाम उनकी जाति के मद्देनजर ही इस्तेमाल किया गया)नाम इस्तेमाल कर भीड़ को संबोधित कर कहां गया ये जहां सब मंत्री बैठे हैं इन कुर्सियो पर वहां आप भी हो सकते हैं.. आप भी सैम बन सकते हैं ऐसा कहां गया.. | फिर भी राहुल को करारी हार मिली बल्कि खुले शब्दों में कहें तो एक शर्मनाक हार मिली.. सवाल उठने लगे की क्या गांधी परिवार के वारिस राहुल अब अपने इस कास्ट टाईटल का लाभ नही उठा पाएंगे.. क्या गांधी नाम का करिश्मा अब खतम हो चुका हैं.. ?
जहां पार्टी और सरकार आए दिन एक,एक कर क्राईसिस पर क्राईसिस झेल रहे हैं वहां युवराज का राजनीतिक करियर शुरू होने से पहले खतम होने की कगार पर हो तो मंत्रियो को इस डैमेज को कंट्रोल करना ही पड़ेगा.. कुछ ऐसा ही शुरू किया केंद्रिय सरकार के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने और बाकी कई नेताओं ने जो राहूल को अब पार्टी और सरकार दोनो में एक सक्रिय भूमिका निभाते देखना चाहते हैं.. दरअसल गांधी परिवार के इतिहास पर रौश्नी डालें तो नेहरू और इंदिरा के बाद एक भी ऐसा राजनितीज्ञ नजर नही आएगा जो खूद की मर्जी से राजनीति के अखाड़े में उतरा हो और नेहरू-इंदिरा जैसी बुलंद छवि काय़म करने में सफ़ल रहा हो..चाहें संजय की मौत के बाद राजीव हो या इंदिरा की मौत के बाद उनके पक्ष में बनने वाला एक भावुक माहौल.. ये भावुक्ता कुछ यूं उमड़ी थी की विमानों से ही अपने सपनों की उड़ान भरने वाले राजीव अब राजनीति के मैदान में उतर चुके थे.. उसके बाद सोनिया के साथ भी क्या हुआ इस से हम भलि भाति परिचीत हैं.. राहुल के पक्ष में ऐसा कोई भी भावात्मक माहौल नही बना जिससे सक्रिय राजनीति में उनका प्रवेश उनकी उदारता को दिखाए क्योंकि उन्होंने मौजूदा राजनैतिक पर्दे पर ऐसा कुछ नही किया जिससे जनता उनसे संभावनाओं की उम्मीद रखे.. उल्टा जब युवा सड़को पर सरकार की भ्रष्ट नीतियों के खिलाफ़ सड़क पर उतरता हैं वो नारे लगाता हैं-इस देश का युवा यहां हैं राहुल गांधी कहां हैं ?
अब राहुल ने सक्रिय राजनीति में उतरने के लिए अपनी ओर से हरी बत्ती तो दें दी हैं पर देखना होगा की दस सांसदो द्वारा सोनिया को भेजे पत्र में उन्हें लोकसभा में सदन का नेता बनाने की मांग स्वीकारी जाती हैं या कोई और रास्ता राहूल के लिए खोजा जाता हैं.. इन सभी घटनाक्रमों में एक बात जो गौर करने वाली हैं वो ये कि अगर राहुल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले अपने आपकों साबित नही कर पाते तो गांधी नाम का जादू अब फूंस हो जाएगा.. जाहिर तौर पर अब राहुल के लिए ये लड़ाई आर या पार का खेल हैं.. जहां कांग्रेस और सरकार में ही मौजूद एक बड़ा तबका उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर देखता हैं वही राहूल जनता की उपेक्षाओं पर क्या रंग डालते हैं ये ही तय करेगा कि आने वाले चन्द महिनो में 2014 के चुनावों की बिसात कैसे बिछती हैं.|
