Thursday, 2 August 2012

भूलना नही वो चीख रही थी,हैवान हस रहे थे और आप देख रहे थे..


हम लोगो की यादाश्त इतनी कमज़ोर होती हैं कि चाहें वो किसी मंत्री द्वारा किया गया कोई घोटाला हो,किसी पार्टी द्वारा चुनावों में किये गए वायदें..या फिर किसी महिला के साथ हुई बदसलूकी.हम सब भूल जाते हैं..भले घटना के वक्त फेसबुक पर चर्चा करना हो ,अपना आक्रोश दिखाना हो या बदस्लूकी की मार्फत इतना मानसिक तौर पर प्रभावित होना के हम अपने आस-पास में रह रहे हर एक मर्द से घृणा करने लगते हैं ..
(ऐसा हाल में गुवाहाटी मामलें के बाद भी देखा गया जब स्त्रीयों का गुस्सा संचार के विभन्न माघ्यमों से बाहर आने लगा)आज इतना आधुनिक हो जाने के बावाजूद भी हमने अपनी पुरूष प्रधान सोच,विचार को इतना अड़ियल बना लिया के सूचना क्रांति के इस युग में उसे(स्त्री) फोन रखकर मार्केट जाने की मनाही हो जाती हैं,किसी स्त्री के साथ कोई मर्द दुष्कर्म करे तो देखा जाता हैं.. 'ये दुष्कर्म कितने बजे हुआ' ? रात में हुआ,तो सीधा सीधा उस महिला को दोषी बना दिया जाता हैं जो पहले से पीड़ित हैं.शहर में रह रही युविका यदि देर रात घर आती हैं तो मोहल्ले में उसे लेकर चालचलन की बातें गढ़ना आम हैं.. कोई मतलब नही कि कैसी परिस्थितियों के मद्दे नज़र वे युविका ऐसा कर रही हैं,या आपके खुद के घर में आपका हुनहार पुत्र कई दिनो तक नदारद रहता हो,क्योंकि उसे तो कंपनी की तरफ से किसी काम के सिलसिले में बाहर जाना पड़ गया,वो घर चलाता हैं..उसका और आपका पेट हैं जो रोटी मांगता हैं,शरीर हैं जो खुली हवा चाहता हैं..एक स्त्री को भला इन सब चीज़ो की क्या जरूरत..एक स्त्री की सारी परेशानी शायद वही से शुरू हो जाती हैं जब वो पैदा होती हैं इस गोल संसार में योनि लिए. यही अंग तय कर देता हैं उसकी आगे की पूरी जिंदगी को.. हम अपने घर के भीतर झांकते हैं तो मां,बहन,बीवी, आदि के रूप में हमे इसी स्त्री की सुरक्षा,आजादी अहम लगने लगती हैं..पर जब यही स्त्री सड़क पर चल रही हो या बस में धक्के खा रही हो,तो हमे बदचलन लगती हैं.. हम सवाल उठाते हैं कि ऐसे माहौल में जहाँ इंसान-इंसान को खा जाता हैं ये छोटी स्कर्ट पहने बाहर क्यो घूम रही हैं.?ये ऐसा मानसिक प्रहार होता हैं हमारे समाज पर जो धीरे धीरे किसी ना किसी रूप में एक दिन स्वतंत्रता पर लगाम कसने में सार्थक साबित होता हैं .. दरअसल ऐसे मामले जिसमें एक स्त्री को प्रताड़ित किया जाता हैं,उसका बल्तकार किया जाता हैं... इनकी सूची इतनी लंबी हैं के आपको जानवरो के प्रति संजिदगी उत्पन करने वाले तमाम खबरिया चैनल हल्के लगने लगेंगे .. अमेरिका में एक सर्वे हुआ तो पाया गया के पीछले दस सालों में भारतीय अखबारों के अनुसार तकरीबन 150 लड़कियों पर तेज़ाब फेका गया..|


स्त्री और पुरूष दो ऐसे सत्य हैं जिनके बिना संसार की कल्पना करना तक असभंव हैं,दोनो एक दूसरे के बिना अधूरे हैं.. फिर जब यहाँ ऐसी स्थिति हो कि दस से बीस हैवान मिलकर एक सौलह साल की बच्ची को पीटे उसके कपड़े फाड़े,सारी भीड़ एक जमावड़ा बनके मूख दर्शक बनी रहे , हम किस चीज की उम्मीद रखना जाय्ज समझ सकते हैं ऐसे समाज से .. जब स्त्री  पूरूषो के कारण ही आसुरक्षा का भाव महसूस करने लगे तो क्या यह कहना गलत नही होगा के खूखार जानवरों को नही ऐसे पुरूष प्रधान समाज को कहना जाय्ज हैं जो आगे कुछ और पीछे कुछ होता हैं.. जहाँ स्त्री पूजी देवी समान जाए और वास्तीविकता में उसे सिर्फ प्रताड़ित किया जाए.. हमारे ग्रंथो में पुराणों में भी वो सहती और सिर्फ सहती आयी हैं.. जब गुवाहाटी में एक बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ तब मैंने देखा के कई स्त्री विमर्शकारी महिलाए हैं जो धड़ले से अपना खेमा बना रही हैं मर्दो के विरोध में.. जिन मर्दो को स्त्रीयों की सुरक्षा के लिए तत्पर रहना चाहिए वो इसमें असफल रहे जब ही लगभग आधे घंटे तक कुछ हैवान मिलकर इस कुकृत्य को साहस से करते रहैं .. |

 शुरूवात में मुझे लगा के इन लोगों को जिन्होंने इसे घिनौनी हरकत को होते हुये देखा उन्हें मानवता के अधिन ही क्यो माना जाए.. ? पर नही बाद में मेरी सोच में परिवर्तन आया.. मुझे महसूस हुआ कि अगर वो लोग जिन्होंने इस कुकर्म को खुली आंखो से देख कर भी प्रतिरोध की भावना को स्वर नही दिया,आगे नही बढ़ सके,ऐसे पिशचों को सबक नही सिखा सके ...जिन पर सारा जमाना थू थू कर रहा हैं,तो उन मूख दर्शक पर कौन सा गर्व करना चाहिए..?दरअसल बहुलता देखे तो मालूम चले के पहली महिला आईपीएस अफ्सर,पहली महिला राष्ट्रपति आदि आकड़ो के बावाजूद भी हम आज भी कई यूग कई सदी पीछे चल रहे हैं .. गुवाहाटी में बच्ची के साथ जो हुआ उससे वो जितना प्रताड़ित हुई उससे अधिक जांच के लिए घटित भेजी 'महिला आयोग' की टीम से हुई होगी.. एयरपोर्ट पर पहुंची टीम इस सलीखे से तस्वीरों के साथ अखबारों पर आई जैसे वो इतने संवेदनशील मसले पर कारवाई करने हेतु नही अपितु पिकनिक के लिए गुवाहाटी गई हैं.. इतना ही नही राष्ट्र शर्म की बात तब हुई जब टीम में शामिल सदस्य 'अलका लाम्बा' ने पीड़ित बच्ची की पहचान मीडिया के आगे सार्वजनिक कर दी.उसके बाद उन्हें टीम से निकाल दिया गया..पर क्या वो खूद उन अपराधियों जितनी दोषी नही हैं,जिन्होंने बच्ची के साथ ऐसा हैवानी व्यवहार किया.? जब कोई महिला बल्तकार जैसी साजिश का शिकार बनती हैं तो उससे अधिक पीड़ा उसे तब होती हैं जब उसकी पहचान जाहिर की जाती हैं,इसलिए पीड़ीत की पहचान सार्वजनिक करना गैर कानूनी हैं..

इतना ही नही जब बल्तकार की शिकायत होती हैं तो किस प्रकार बिना अनुमती के कोई जांच यंत्र उसकी योनि में घुसेड़ दिया जाता हैं और नर्स या बाकी अधिकारी.. जब उसे बल्तकार पीड़ित कह,कह कर,उसकी आत्मा तक रौंद देते हैं.. सही मायनों में तब उसका समाजिक कत्ल होता.. ऐसा आप कुछ माह पहले की एक तहलका रिपोर्ट में भी पढ़ सकते हैं..सोच का विषय यह भी हैं कि कैसे "पुलिस और आम लोगो" के बीच भरोसे का पुल बनाया जाए.. वो भी तब जब लखनाऊ के एक थाने में ही पुलिस द्वारा कैदी महिला के साथ जोर जबरदस्ती का मामला सामने आएं.. गुवाहाटी में कुछ दरिंदे मिलकर सरे आम छाती चौड़ी कर देश की इज्जत को रौंद रहे हो,आधे गंटे तक रौंदते रहे.. उसके बाद भी सभी आरोपी कई दिनों तक हत्थे ना चड़े,पुलिस अधिकारी खुद महिलाओ के पहनावें को दोषी मानते हो,उत्तेजनक करार करते हो..| उस मीडिया का भी क्या कहें.. जिसके संपादक रात को बार(पब)जाने वाली अधिकांश लड़कियो को वैशया कह कर पुकारे(गुवाहाटी मामले के बाद ही वही के एक स्थानीय चैनल के एडीटर द्वारा कहीं गई बात)दरअसल इस बार हमें हमेशा की तरह ऐसी दुखद घटना से आगे तो बढ़ना ही हैं ,बढ़ना होगा भी पर इन सभी चीज़ो को भूले बिना| याद रखना होगा एक,एक बात को और जरूरी हैं कि सार्वजनिक जीवन में भी हम सतर्क रहे सिर्फ अपनी बहन,बेटी,प्रेमिका के लिए नही बल्कि इस पूरे समाज के लिए और किसी विकृत मानसिकता को फलने फूलने ना दे कर,उसका विरोध करे चाहें वो हवस भरी नज़रो से मेट्रो में किसी महिला को किसी पुरूष द्वारा घुरना हो या बस की भीड़ का लाभ उठाये चिपकना ..अभी भी वक्त हैं एक बहतर समाज को विकसित होने देने का .. |

Thursday, 26 July 2012

राहुल गांधी की आर या पार की राजनीतिक जंग..



गांधी परिवार के युवराज को लेकर काफ़ी समय से चली आ रही सक्रिय राजनीति की मांग अब धीरे धीरे साफ होती जा रही हैं..  2004 से अमेठी लोकसभा से सांसद बने राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत अपने पिता स्वर्गीय राजीव गांधी के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र(अमेठी)से की. फिर यही सिलसिला उन्होंने 2009 के लोकसभा चुनाव में बरकरार रखा और इस बार निकटम प्रतिद्वंद्वी को 3,33,000 वोटों के अंतर से पराजित कर उत्तर प्रदेश के अमेठी को अपना निर्वाचन क्षेत्र बनाएं रखा.. इसी उत्तर प्रदेश को आगे चल कर उनके राजनीजिक भविष्य से जोड़ कर देखा जाने लगा.. जहां लंबे समय से कांग्रेस मूहं की खाती आई.. वही की जिम्मेदारी उनके कंधो पर सौपी गयी.. उन्हें उत्तर प्रदेश 2012 विधानसभा चुनाव एक स्टार  प्रचारक और मुख्य रणनीतिक नेता के रूप में दिया गया.

 राहुल ने बेहिसाब रैलियां,सभाएं की.. उसके बावजूद अपनी जमीनी स्तर की सक्रिय राजनीति के लिए पहचाने जाने वाले राहुल,उत्तर प्रदेश 2012 विधानसभा चुनाव में विफल रहे.. पार्टी छ: सीटे अधिक तो लें पाई पर उपेक्षाओं पर खड़ी नही उतर पाई. यदि पार्टी यहां अच्छा करती जैसे की कयास लगाए जा रहे थे, और नंबर 3 पर भी आती तो संभव था की तब ही से राहुल का रास्ता एक बेहद ही बड़े और महत्वपूर्ण पद के लिए खोला जाता.. पार्टी के अधिकांश नेताओं ने इस हार का दाग राहुल पर नही लगाना ठीक समझा.. चाहें हार के कारणों पर विचार विमर्श करने वाली एंटनी कमेटी हो,सब ने 
उन्हें क्लीनचिट दीं पर स्वंय राहुल ने इस हार को खूद की विफलता से जोड़ कर मीडिया के समक्ष कबूल किया.स्थिति साफ थी अपने राजनीतिक करियर की शुरू्आत के साथ जातिगत राजनीति का सफ़ाया हो,कहने वाले राहुल खूद जातिगत राजनीति का कार्ड चल कर भी खाली निराशा लिए यूपी से वापस लौटे.
(यूपी के रमानगर में  सैम पित्रोदा का असली नाम सत्यनारण गंगाराम पित्रोदा बता कर ये कहना की पित्रोदा मेरे पिता के अच्छे मित्र थे.. एक माईंड गेम जातिगत राजनीति ही थी,उनके रहते सलमान का अल्पसंख्यक समुदाय को आरक्षण का लाँलीपाँप दिखाना क्या था?.. सत्यनारयण पित्रोदा जिनकों लोग अब सिर्फ सैम के नाम से जानते हैं,दूरसंचार क्रांति के जनक के रूप में जानते हैं,उनका नाम उनकी जाति के मद्देनजर ही इस्तेमाल किया गया)नाम इस्तेमाल कर भीड़ को संबोधित कर कहां गया ये जहां सब मंत्री बैठे हैं इन कुर्सियो पर वहां आप भी हो सकते हैं.. आप भी सैम बन सकते हैं ऐसा कहां गया.. | फिर भी राहुल को करारी हार मिली बल्कि खुले शब्दों में कहें तो एक शर्मनाक हार मिली.. सवाल उठने लगे की क्या गांधी परिवार के वारिस राहुल अब अपने इस कास्ट टाईटल का लाभ नही उठा पाएंगे.. क्या गांधी नाम का करिश्मा अब खतम हो चुका हैं..  ?

जहां पार्टी और सरकार आए दिन एक,एक कर क्राईसिस पर क्राईसिस झेल रहे हैं वहां युवराज का राजनीतिक करियर शुरू होने से पहले खतम होने की कगार पर हो तो मंत्रियो को इस डैमेज को कंट्रोल करना ही पड़ेगा.. कुछ ऐसा ही शुरू किया केंद्रिय सरकार के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने और बाकी कई नेताओं ने जो राहूल को अब पार्टी और सरकार दोनो में एक सक्रिय भूमिका निभाते देखना चाहते हैं..  दरअसल गांधी परिवार के इतिहास पर रौश्नी डालें तो नेहरू और इंदिरा के बाद एक भी ऐसा राजनितीज्ञ नजर नही आएगा जो खूद की मर्जी से राजनीति के अखाड़े में उतरा हो और नेहरू-इंदिरा जैसी बुलंद छवि काय़म करने में सफ़ल रहा हो..चाहें संजय की मौत के बाद राजीव हो या इंदिरा की मौत के बाद उनके पक्ष में बनने वाला एक भावुक माहौल.. ये भावुक्ता कुछ यूं उमड़ी थी की विमानों से ही अपने सपनों की उड़ान भरने वाले राजीव अब राजनीति के मैदान में उतर चुके थे.. उसके बाद सोनिया के साथ भी क्या हुआ इस से हम भलि भाति परिचीत हैं.. राहुल के पक्ष में ऐसा कोई भी भावात्मक माहौल नही बना जिससे सक्रिय राजनीति में उनका प्रवेश उनकी उदारता को दिखाए क्योंकि उन्होंने मौजूदा राजनैतिक पर्दे पर ऐसा कुछ नही किया जिससे जनता उनसे संभावनाओं की उम्मीद रखे.. उल्टा जब युवा सड़को पर सरकार की भ्रष्ट नीतियों के खिलाफ़ सड़क पर उतरता हैं वो नारे लगाता हैं-इस देश का युवा यहां हैं राहुल गांधी कहां हैं ?

अब राहुल ने सक्रिय राजनीति में उतरने के लिए अपनी ओर से हरी बत्ती तो दें दी हैं पर देखना होगा की दस सांसदो द्वारा सोनिया को भेजे पत्र में उन्हें लोकसभा में सदन का नेता बनाने की मांग स्वीकारी जाती हैं या कोई और रास्ता राहूल के लिए खोजा जाता हैं.. इन सभी घटनाक्रमों में एक बात जो गौर करने वाली हैं वो ये कि अगर राहुल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले अपने आपकों साबित नही कर पाते तो गांधी नाम का जादू अब फूंस हो जाएगा..  जाहिर तौर पर अब राहुल के लिए ये लड़ाई आर या पार का खेल हैं.. जहां कांग्रेस और सरकार में ही मौजूद एक बड़ा तबका उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर देखता हैं वही राहूल जनता की उपेक्षाओं पर क्या रंग डालते हैं ये ही तय करेगा कि आने वाले चन्द महिनो में 2014 के चुनावों की बिसात कैसे बिछती हैं.|

Tuesday, 8 May 2012

बोल की लब आज़ाद है तेरे..बेड़िया महसूस कर उसे उतार के नाचे |


हाथो की उंगलियो के बीच में सिगरेट फसाते हुए  होठ से सुलगा कर वे बोला - ये कोई सब्ज़ी मंडी नही है भाई, बढ़े बेकार आदमी हो .. मैं उस समय आमरण अनशन पर बैठे असीम और आलोक जी के साथ जंतर मंतर पर मौजूद था.तीन दिन की अनुमति मिलने के बाद 2 से 5 तक का धूप से बचने का एकमात्र उपाय टेंट भी हटने वाला था.. पर्मिशन के अनुसार 3 दिन पूरे हो चुके थे,टेंट मालिक पर्ची निकाल 3 दिन के 5000 रुपय माँगने लगता है जो सुन के हम बोहचके रह जाते है..पैसे वाजीफ लीजिए कहने की बात पर वो .. आलू बेनगन की तरह हमारे चेहरे पर सब्ज़ी मंडी आदि जैसी टिपणी दाग गया.खैर कुछ देर आंदोलन रणनीति को लेकर आत्मा मंथन चला फ़ैसला हुआ के हम इसे जारी रखेंगे.क्योकि,जिस मकसद के लिए सेव यूअर वाय्स :आ मूवमेंट अगेन्स्ट वेब सेन्सरशिप लड़ रहा है वे मसला है इंटरनेट का जहा आप और हम अपने विचारो को पंख प्रदान करते है.

मुद्दा है इन पंखों के काटे जाने का और उसका बचाव करने का .. !

आगे की बातें मैं आपके सामने प्रस्तुत करू उस से पहले कुछ महत्वपूर्ण  बातो पर गौर कीजिए-
आई टी एक्ट 2011 की इंटेरमीडिएटरी गाइड्लाइन्स को निरस्त करने का एक लौटा मौका बचता है अब जब केरल के एक सांसद राज्यसभा में एनलमेंट मोशन लाने जा रहे है इसके बाद आईटी एक्ट 2011 में सिर्फ़ संशोधन होना संभव होगा वे कितना कठिन है यह बात आप समझ सकते है जब लगभग 90 से 99 विधेयक संसद में पारित होने के लिए अरसे से रुके रहे. आई टी एक्ट 2011 समझने में जितना पेचीदा है उसको जानना भी आप के लिए उतना ही अहम है क्योकि यह वे एक्ट है जिसके अनुसार आप के खिलाफ एक शिकायत भर से आप की वेबसाइट ,कॉंटेंट,ब्लॉग,(मेरा भी हो जाए तो समझ जाइएएगा)आदि सब ब्लॉक हो सकता है.
आप को इस बाबत लीगल नोटिफिकेशन भी नही दी जाएगी और आप की अभिव्यक्ति का कत्ल हो जाएगा. महत्पूर्ण बात यह भी है के किस ने आपके खिलाफ कंप्लेंट की इसकी जानकारी भी आप को नही दी जाएगी,ना ही आप अपना पक्ष रख सकेंगे और 36 घंटे के भीतर आपकी निजता पर नीचता का कार्य आसानी से सफल हो जाएगा.जब आप कोई ग़लत कार्य करते है तब भी आपको अपना पक्ष रखने का मौका प्रदान किया जाता है चाहे आप कोर्ट में लड़ रहे हो,या पुलिस थाने में,यहा आपके उपर कारवाई की जाएगी उसके बाद आप के पास एक उपाय बचता है के आप अपनी वेबसाइट ब्लॉग या फेसबुक अकाउंट की खातिर कोर्ट तक जाए ?

क्या आप ऐसा करेंगे .. बहुतरे लोग ऐसे है जिन्हे फेसबुक पर करीना ऐश्वरिया की तस्वीर उपलोड करना या सत्यमेव जयते करना भी आता है पर इस मामले की तनिक भर भी जानकारी नही है.भागम भाग की इस संघर्षकारी ज़िंदगी में इंसान हर वक़्त दो जून की रोटी के लिए व्यस्त रहता है .. यह बात लाजिम भी है ..
दफ़्तर छोड़ कोर्ट कचेरी जाएँगे रोज तो बीवी बच्चो को चूयिंग गम खिलाने से काम नही चलेगा .. पर बात है के जब अभी हमारे पास एक अवसर बचा है अपनी अभिव्यक्ति को ज़िंदा रखने का तब हम क्यो 1 दिन निकाल इस शुभ कार्य में खुद की भूमिका नही निभाते .. यह बात  स्वीकृत  है के इंटरनेट के महासागर जैसी अद्भुत जगह पर कुछ आसामाजिक तत्व है जो कई दफ़ा अंडसंद कार्य कर लोगो की भावनाओ को ठेस पहुचाने का प्रयास करते है .. पर सवाल है के एक कॉंटेंट आपतिजनक है ये कौन तय करेगा.आप मैं या वे क्राइम ब्रांच के अधिकारी जिन्होने असीम त्रिवेदी की कार्टूनिस्ट अगेन्स्ट करप्षन साइट एक वकील की शिकायत पर ब्लॉक कर दी थी.आप भी मेरे खिलाफ कंप्लेंट कर मेरे ब्लॉग को ब्लॉक करवा सकते है उसके पैदा होने के साथ उसका अंतिम संस्कार करवा सकते है और क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्टून बनाना .. लिखना भी आपतिजनक है.
अन्ना हज़ारे का अगस्त का रामलीला आंदोलन हो या फिर निर्मल बाबा पर इंटरनेट पर ओलों सी गिरती प्रतिक्रियाएं सब में एक आम आदमी अपनी बात खुले मंच पर रख पाया.. जो प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया टेम मीटर के आधार पर यह तय करता है के हम क्या देखेंगे और क्या नही .. यहा उस पेमाने को हटा कर सरोकार से जुड़ी बात हुई आम जनता का सरोकार .. फिर सेव यूअर वाय्स की टीम यह कतई नही कहती के आईटी एक्ट को ख़तम ही कर दिया जाए वह माँग कर रहे है ऐसे क़ानून की जो इंटरनेट को और भी शक्ति प्रदान करे उसे और मजबूत करे.. जिस तरह का मौजूदा क़ानून अभी है वो इंटरनेट के बढ़ते सूरज को और बढ़ने ना दे कर उसे डूबने पर आमादा रहेगा .. गांव कस्बो तक मोबाइल क्रांति अपनी पहुच स्थापित कर रही है पर इंटरनेट का क्या ..  हम कैसे आधुनिकीकरण की बात कर पिछड़ापन अपनाकर क़ानूनी करवाई का हवाला दे सकते है.
क़ानून हो के कम से कम जानकारी दी जाए के किस ने आपके खिलाफ और किस चीज़ को लेकर शिकायत की.. अपनी बात रखने का मौका दिया जाए.. हो सकता है के कॉंटेंट सत्य में कुछ अधिक ही आपतिजनक हो ऐसे में मामला पूरा होने तक वे साइटो पर पढ़ा रहे तो ये ठीक बात नही पर कुछ दिन की मोहलत तो दी जाए के आप इस या उस चीज़ को लेकर क्या पक्ष रखना चाहेंगे और यदि उसे पेज को ब्लॉग को हटा भी दिया जाए तो कम से कम उसके सही साबित होने के बाद उसे वापस डाला जाए..किंतु यहा स्थिति इतनी दुर्भाग्यपूर्ण है के आपको कुछ जानकरी ही नही दी जाएगी तो आप क्या कहेंगे और क्या सुनेंगे.आज असीम और आलोक जी के अनशन को 7 वा दिन है .. 5 दिन के बाद से उन्होने जल भी त्याग दिया है .. इसी वजह से निर्जलीकरण से तबीयत बिगड़ी और दिल्ली पुलिस ने उन्हे आरएमएल अस्पताल में भरती करवा दिया .. फिर भी दोनो युवा अनशन वही से जारी रखते हुए हमारा इंतजार कर रहे है .. क्या हम इतने लालची और पाखंडी है के समझ ना पाए क्या सही है और क्या ग़लत ना समझने का प्रयास करे. कम से कम रूचि तो लीजिए और चलिए अपने ब्लॉग फेसबुक पर उनके बारे में लिखे और अपनी अभिव्यक्ति की लड़ाई में खुद भी शामिल हो..|